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इस्लामिक देश के सुल्तान ने मुस्लिमों से की अपील बकरीद पर ना दें कुर्बानी

 रबात

उत्तर अफ्रीकी इस्लामिक देश मोरक्को के राजा ने लोगों से इस साल बकरीद यानी ईद-उल-अज़हा (Eid Al-Adha) के मौके पर धार्मिक त्यौहार के दौरान भेड़ों की कुर्बानी नहीं देने का आह्वान किया है। राजा मोहम्मद-VI ने अपने देश के लोगों से कहा है कि देश लगातार सातवें साल सूखे की मार झेल रहा है। इस वजह से देश में पशुधन की आबादी कम हो गई है और मांस की कीमतें बढ़ गई हैं। ईद-उल-अज़हा के दौरान हर साल दुनिया भर में बसे मुसलमान लाखों भेड़, बकरियों और अन्य पशुओं की बलि देते हैं।

इस साल ईद-उल-अज़हा 6 जून या 7 जून को मनाया जाएगा। यह इस्लाम के दो प्रमुख त्योहारों में से एक है। इस्लामिक मान्यता के अनुसार, ईद-उल-अज़हा हजरत इब्राहिम की कुर्बानी की याद में मनाया जाता है। इसे बकरीद, ईद उल जुहा, बकरा ईद अथवा ईद उल बकरा के नाम से भी जाना जाता है। बकरीद के मौके पर नमाज पढ़ने के साथ-साथ जानवरों की कुर्बानी देने की प्रथा है। कुर्बानी के बाद मुस्लिम समुदाय उस मांस को अपने परिजनों के बीच बांटकर खाता है और एक हिस्सा गरीबों में भी दान करता है।

राष्ट्रीय टेलीविजन पर धार्मिक मामलों के मंत्री द्वारा पढ़े गए राजा मोहम्मद VI के भाषण में कहा गया है, "हमारा देश जलवायु और आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, जिसके परिणामस्वरूप पशुधन में काफी गिरावट आई है। इसलिए ईद पर पशुओं की कुर्बानी से बचें।" ईद के त्यौहार के महत्व को स्वीकार करते हुए, राजा ने अपने लोगों से "कुर्बानी की रस्म निभाने से परहेज करने" का आह्वान किया।

ईद उल-अजहा इस साल जून की शुरुआत में मनाया जाएगा. यह बलिदान का पर्व है जिसमें मुसलमान पशुओं की कुर्बानी देते हैं. मोरक्को में भेडों की कीमतें इतनी ज्यादा हो गई हैं कि पिछले साल देश के गैर सरकारी संगठन ‘मोरक्को सेंटर फॉर सिटिजनशिप’ द्वारा किए गए सर्वेक्षण में 55 प्रतिशत परिवारों ने कहा कि उन्हें भेड़ों को खरीदने और कुर्बानी के बाद उन्हें पकाने के लिए बर्तन खरीदने तक में मुश्किलें आ रही हैं.

भेड़ों की कीमतों में उछाल का कारण चरागाहों का कम होना है, जिससे इन्हें चारा खिलाने के लिए इनके मालिकों को ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है. मोरक्को के कृषि मंत्री ने इस महीने की शुरुआत में बताया था कि इस मौसम में बारिश पिछले 30 वर्षों के वार्षिक औसत से 53 प्रतिशत कम हुई है और इस कारण भेड़ और मवेशियों की संख्या में कमी आई है.

मोहम्मद VI के पिता हसन II ने 1966 में भी इसी तरह का आह्वान किया था, जब देश में लंबे समय तक सूखा पड़ा था। पशुधन की संख्या में गिरावट के कारण मांस की कीमतों में उछाल आया है – जिससे गरीबों पर बोझ बढ़ गया है, जिनकी न्यूनतम मजदूरी लगभग 290 यूरो प्रति माह है। मोरक्को इस बार लगातार सातवें साल सूखे का सामना कर रहा है। इस वजह से वहां 12 महीनों में पशुधन की संख्या में 38 फीसदी की गिरावट आई है। मोरक्को के कृषि मंत्रालय के अनुसार, पिछले 30 वर्षों के औसत से 53 फीसदी कम बारिश हुई है।

बता दें कि मोरक्को में 99 फीसदी से अधिक आबादी सुन्नी मुस्लिमों की है, और 0.1 प्रतिशत से कम आबादी शिया मुस्लिमों की है। कुल आबादी का 1 प्रतिशत से कम हिस्सा बनाने वाले समूहों में ईसाई, यहूदी और बहाई भी शामिल हैं।

Dinesh Kumar Purwar

Editor, Pramodan News

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