कंडोम महंगे करने से क्या बढ़ेगी जनसंख्या? चीन के डर से भारत के लिए क्या है यह मौका?

बीजिंग
बीते तीन सालों से चीन एक ऐसी लड़ाई लड़ रहा है, जिसमें न तो तोपें चल रही हैं और न ही मिसाइलें। यह लड़ाई है- जनसंख्या बचाने की। एक देश जो कभी दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाला था, वह अब अपनी आबादी घटने से परेशान है। चीन लंबे समय तक 'वन चाइल्ड पॉलिसी' से जनसंख्या नियंत्रित करता रहा, अब इसके उलटा हो गया है। चीन से आए ताजा आंकड़े बताते हैं कि 2025 में लगातार तीसरे साल उसकी आबादी में गिरावट दर्ज की गई है। स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि चीन की सरकार अब बच्चों को बढ़ाने की हर कोशिश कर रही है- यहां तक कि कंडोम और गर्भनिरोधक गोलियां महंगे कर दिए। सवाल यह है: क्या कंडोम महंगे करने से जनसंख्या बढ़ जाएगी? और यह संकट ग्लोबल सप्लाई चेन, आपके फोन-गैजेट्स की कीमतों और भारत जैसे युवा देशों पर कैसे असर डालेगा? आइए समझते हैं।
चीन का डर: बूढ़ा होता ड्रैगन
दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा कोई विदेशी दुश्मन नहीं, बल्कि उसकी अपनी जनसांख्यिकी है। 2025 के आंकड़े बताते हैं कि मरने वालों की संख्या पैदा होने वाले बच्चों से कहीं ज्यादा है। चीन ने एक बच्चा नीति को सख्ती से लागू किया था। आज वही नीति उसके गले की फांस बन गई है। उस वक्त जो बच्चे पैदा नहीं हुए, आज वो 'युवा वर्कफोर्स' (काम करने वाले लोग) के रूप में मौजूद नहीं हैं। चीन की चुनौती सिर्फ कम जन्मों तक सीमित नहीं है; तेजी से बढ़ती उम्रदराज आबादी भी उतनी ही बड़ी समस्या है। 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के लोग अब कुल आबादी के 20% से अधिक हो चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुमान बताते हैं कि 2100 तक यह अनुपात 50% तक पहुंच सकता है। इसके नतीजे दूरगामी हैं- कामकाजी आबादी सिकुड़ेगी, आर्थिक वृद्धि पर दबाव बढ़ेगा और स्वास्थ्य व पेंशन पर सरकारी खर्च तेजी से ऊपर जाएगा।
क्यों घट रही है चीन की जनसंख्या?
चीन की यह समस्या नई नहीं। 1980 से 2015 तक 'वन चाइल्ड पॉलिसी' चली, जिसमें ज्यादातर परिवारों को सिर्फ एक बच्चा करने की इजाजत थी। इसका मकसद तेजी से बढ़ती आबादी को काबू करना था। नतीजा? जन्म दर तेजी से घटी। 2016 में दो बच्चे, 2021 में तीन बच्चों की इजाजत दी गई, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। आज युवा कपल बच्चे नहीं चाहते। कारण साफ हैं:
बच्चा पालना बहुत महंगा: एक रिपोर्ट के मुताबिक, चीन में एक बच्चे को 18 साल तक पालने का खर्च करीब 5.38 लाख युआन (लगभग 76 हजार डॉलर) है। शहरों में तो एक करोड़ युआन से ज्यादा।
नौकरी का दबाव, हाउसिंग महंगी, शिक्षा और हेल्थकेयर का बोझ।
महिलाओं पर घर और करियर दोनों का भार।
शादियां भी कम हो रही हैं- 2025 में रिकॉर्ड कम शादियां हुईं।
2024 में जन्म थोड़े बढ़े क्योंकि 'ड्रैगन ईयर' था (चीनी संस्कृति में शुभ माना जाता है) और कोविड के बाद देरी से शादियां हुईं। लेकिन 2025 में फिर जन्मदर घट गई। संयुक्त राष्ट्र की भविष्यवाणी कहती है कि 2050 तक चीन की आबादी 200 मिलियन कम हो सकती है और बुजुर्गों की तादाद दोगुनी होगी।
चीन की जनसांख्यिकीय पहेली: नीति खत्म हुए दस साल, लेकिन आबादी संकट गहराता हुआ
1 जनवरी 2026 को उस फैसले को दस साल पूरे हो गए, जब चीन ने औपचारिक रूप से अपनी कुख्यात एक-बच्चा नीति को खत्म किया था। यह नीति तीन दशकों से भी अधिक समय तक चीन के पारिवारिक जीवन और सामाजिक संरचना को आकार देती रही। वर्ष 2016 में इसे समाप्त करने का निर्णय एक कठोर हकीकत से उपजा था- जन्म दर इतनी तेजी से गिर रही थी कि वह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की दीर्घकालिक ऊर्जा और स्थिरता के लिए खतरा बन गई थी। लेकिन एक दशक बाद, तमाम नीतिगत बदलावों और प्रोत्साहनों के बावजूद, बीजिंग जनसंख्या में आ रही ऐतिहासिक गिरावट को रोकने में नाकाम दिख रहा है।
चीन की कुल जनसंख्या 2022 में पहली बार 60 से अधिक वर्षों में घटनी शुरू हुई। नेशनल ब्यूरो ऑफ स्टैटिस्टिक्स के अनुसार, 2022 में आबादी घटकर 1.411 अरब रह गई- एक साल पहले के मुकाबले करीब 8.5 लाख कम। इसकी घोषणा 2023 में की गई थी। विश्लेषकों ने इसे 1961 के बाद पहली जनसंख्या गिरावट बताया, जब माओ त्से तुंग की ग्रेट लीप फॉरवर्ड नीति से उपजे भीषण अकाल ने देश को झकझोर दिया था। 2023 और 2024 में भी यह संकुचन जारी रहा। 2024 में जन्मों में मामूली बढ़त के बावजूद, मौतों की संख्या अधिक रहने से कुल आबादी घटती रही और विशेषज्ञ इस उछाल को स्थायी मोड़ मानने से इनकार कर रहे हैं।
जन्मों में तेज गिरावट
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 2024 में चीन में लगभग 95 लाख बच्चों का जन्म हुआ- जो 2019 के 1.47 करोड़ जन्मों से बहुत कम है। यह गिरावट ड्रैगन वर्ष जैसी सांस्कृतिक मान्यताओं से जुड़े अस्थायी उछाल के बावजूद दर्ज हुई। वास्तविक तस्वीर यह है कि युवा पीढ़ी बढ़ती महंगाई, आवास लागत, शिक्षा खर्च, असुरक्षित नौकरियों और कार्य-जीवन असंतुलन जैसी चिंताओं से जूझ रही है, जिससे परिवार बढ़ाने का फैसला और कठिन हो गया है।
2025 का अनुमान है कि चीन में लगभग 87 लाख बच्चे पैदा हुए होंगे, जो भारत के बाद दुनिया में दूसरे नंबर पर है। हालांकि कुछ एनालिसिस में यह संख्या 73 से 78 लाख के बीच रहने का अनुमान है। यह सरकारी कोशिशों के बावजूद कम फर्टिलिटी रेट, लाइफस्टाइल में बदलाव और डेमोग्राफिक बदलावों के कारण लगातार गिरावट को दिखाता है। यह संख्या पिछले सालों की तुलना में काफी कम है।
2026 का विवादित कदम
सबसे हालिया और विवादित फैसला, 1 जनवरी 2026 से लागू हुआ है। इसके तहत सरकार ने गर्भनिरोधकों पर 13% वैल्यू-एडेड टैक्स (VAT) लगाना शुरू किया है, जबकि चाइल्डकेयर सेवाओं, विवाह-संबंधी सेवाओं और वरिष्ठ नागरिक देखभाल को कर-मुक्त रखा गया है। पहले 1994 से ये टैक्स-फ्री थे, क्योंकि तब जनसंख्या नियंत्रण नीति थी। अब नीति उलटी है- बच्चे पैदा करो! सरकार का तर्क है कि इससे जन्मोत्साहन और पारिवारिक समर्थन सेवाएं मजबूत होंगी। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि गर्भनिरोधकों पर कर महिलाओं के प्रजनन अधिकारों और स्वास्थ्य विकल्पों पर प्रतिकूल असर डाल सकता है और यह कदम सामाजिक असंतोष को भी जन्म दे सकता है। एक बॉक्स कंडोम पर 5-20 युआन (40-60 रुपये) ज्यादा लगेंगे। इसका खतरा ये भी है कि अनचाही प्रेग्नेंसी और HIV जैसी बीमारियां बढ़ सकती हैं।
चीन का डर: काम करने वाले हाथ कम हो रहे
चीन को 'वर्ल्ड फैक्ट्री' कहा जाता है क्योंकि यहां सस्ता लेबर मिलता था। आपके घर का टीवी, हाथ का मोबाइल और बच्चों के खिलौने- ज्यादातर चीन में बनते हैं क्योंकि वहां सस्ता लेबर (मजदूर) उपलब्ध था। लेकिन अब वर्किंग एज (16-59 साल) आबादी 2012 से घट रही। 2024 में 22% लोग 60 साल से ऊपर थे। 2035 तक बुजुर्ग 400 मिलियन हो सकते हैं। नतीजा:
फैक्टरियां में वर्कर कम यानी प्रोडक्शन महंगा।
पेंशन और हेल्थकेयर पर बोझ बढ़ेगा।
अर्थव्यवस्था धीमी पड़ेगी, चीन 'ओल्ड बिफोर रिच' हो रहा।
2026 में आप पर और दुनिया पर क्या असर होगा?
चीन की यह समस्या सिर्फ उसकी नहीं है, इसका सीधा असर आपकी जेब पर पड़ने वाला है। एप्पल से लेकर सैमसंग तक, बड़ी कंपनियों की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स चीन में हैं। अगर वहां लेबर कॉस्ट (मजदूरी) बढ़ती है, तो उत्पादन लागत बढ़ेगी। नतीजा- 2026 में आने वाले नए आईफोन, लैपटॉप और गैजेट्स की कीमतें बढ़ सकती हैं। श्रमिकों की कमी से प्रोडक्शन धीमा होगा। इसका मतलब है कि सामान की डिलीवरी में देरी होगी। कोरोना काल में हमने देखा था कि सप्लाई चेन टूटने पर महंगाई कैसे भागती है।
भारत के लिए मौका या चुनौती?
चीन की यह मुसीबत भारत के लिए एक 'गोल्डन चांस' है।
युवा भारत: जहां चीन की औसत उम्र 39 साल के पार जा रही है, वहीं भारत की औसत उम्र अभी भी 28 साल के आसपास है। हमारे पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा वर्कफोर्स है।
कंपनियों का मोहभंग: चीन में बढ़ती लागत और अनिश्चितता के कारण, बहुराष्ट्रीय कंपनियां (MNCs) अब 'China Plus One' (चीन के अलावा एक और विकल्प) की रणनीति अपना रही हैं।
भारत की ओर रुख: फॉक्सकॉन और माइक्रोन जैसी कंपनियां भारत में प्लांट लगा रही हैं। अगर भारत अपनी इंफ्रास्ट्रक्चर और पॉलिसी को और बेहतर कर ले, तो 2026 तक भारत मैन्युफैक्चरिंग का नया हब बन सकता है।
कुल मिलाकर चीन की जनसंख्या संकट से भारत को बड़ा अवसर मिल रहा है- 'चाइना प्लस वन' रणनीति के तहत कंपनियां भारत में मैन्युफैक्चरिंग शिफ्ट कर रही हैं, जिससे 2026 में ज्यादा निवेश, नौकरियां और आर्थिक ग्रोथ बढ़ेगी। भारत की युवा आबादी (वर्किंग एज) चीन से ज्यादा होने से हम ग्लोबल सप्लाई चेन में मजबूत स्थिति बना सकते हैं, बशर्ते स्किल डेवलपमेंट और इंफ्रा पर फोकस करें।




