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जबलपुर की शिक्षिका मंजू जायसवाल का अनोखा प्रयोग, चित्रों के जरिए बच्चों को सिखा रही हैं गणित, 95% रिजल्ट

जबलपुर
 शहर से लगभग 5 किलोमीटर दूर रेगवा नाम का एक बड़ा गांव है. इस गांव में सरकारी माध्यमिक शाला स्कूल है, इसमें छठवीं से लेकर आठवीं तक की पढ़ाई होती है. कुल मिलाकर तीन क्लासों में 120 से ज्यादा बच्चों का एडमिशन है. इसी स्कूल में मंजू जायसवाल गणित की शिक्षिका है. मंजू जायसवाल का पढ़ाई का तरीका बिलकुल अलग है. दरअसल उन्होंने मैथ्स की पढ़ाने के लिए एक अनोखा प्रयोग किया है.

बच्चों के मन से गणित का निकाला डर
मंजू जायसवाल का कहना है कि, ''उन्होंने बच्चों को पढ़ाने के दौरान पाया कि बच्चों को गणित बहुत कठिन लगती है और गणित की वजह से कई बार बच्चे स्कूल तक नहीं आते हैं. इन बच्चों को घर में भी कोई पढ़ाने वाला नहीं होता ना ही ये ट्यूशन पढ़ते हैं. ऐसी स्थिति में इनकी गणित बहुत कमजोरी रहती है. इसलिए हमने एक नया प्रयोग शुरू किया और गणित को रंगों और चित्रों के माध्यम से पढ़ाना शुरू किया.''

बच्चों की पढ़ाई में हुआ सुधार 
मंजू जायसवाल का कहना है कि, ''पढ़ने में बच्चा कितना भी कमजोर हो लेकिन चित्रों और रंगों के प्रति बच्चों का आकर्षण रहता है. इसलिए जैसे ही हमने यह प्रयोग शुरू किया तो बच्चों ने गणित में भी इंटरेस्ट लेना शुरू कर दिया.हमारी टीम जब स्कूल में पहुंची तो उस समय स्कूल में 15 बच्चे थे. दरअसल अभी नए साल की क्लास शुरू हुई है, इसलिए स्कूल में उपस्थिति की संख्या कम है और ज्यादातर बच्चे नए हैं. लेकिन इसके बावजूद मंजू जायसवाल ने बच्चों को एक चित्र बनाने के लिए कहां और उन्होंने बच्चों से पूल बनवाया.

95 प्रतिशत हुआ स्कूल का रिजल्ट
बच्चों ने तुरंत फूल बनाना शुरू कर दिया फिर स्कूल के भीतर उन्होंने गणित की संख्या रखी और बच्चों से भी कहा कि इस गणित की संख्या से जुड़े हुए सवाल को हल करें. लगभग सभी बच्चों ने इसकी कोशिश की, कुछ बच्चे इसमें सफल भी रहे. मंजू जायसवाल ने बताया कि, पिछले सालों में हमारे स्कूल का रिजल्ट लगभग 95% रहा है जिसमें गणित विषय में सभी को फर्स्ट डिवीजन के मार्क्स मिले हैं.

बच्चों का लग रहा पढ़ाई में मन
राधिका इसी स्कूल में 2 सालों से पढ़ रही है. उनका कहना है, ''उसका मन भी शुरू में गणित में नहीं लगता था लेकिन चित्रों के जरिए जब से गणित पढ़ना शुरू किया है तब से उनकी गणित अच्छी हो गई है और अब भी चित्रों के माध्यम से ही गणित को समझती हैं.'' स्कूल के प्रधानाध्यापक शैलेंद्र दुबे का कहना है कि ''हमारी कोशिश होती है कि हम ज्यादातर सामान्य शिक्षा को रुचि कर बनाकर पेश करें. पहले चित्रों का उपयोग केवल सामाजिक विज्ञान पर्यावरण जैसे विषयों में ही होता था लेकिन हमने गणित में भी इसका प्रयोग शुरू किया तो अच्छे परिणाम मिले.''

सरकारी स्कूलों के शिक्षक शिक्षा को नौकरी की तरह करते हैं बहुत हद तक उनकी कोशिश बच्चों को सिखाने की नहीं होती. यदि सरकारी माध्यम के स्कूलों में शिक्षक पूरी जिम्मेदारी के साथ छात्रों को पढ़ाना शुरू करें तो सरकारी स्कूल से भी होनहार बच्चे निकल सकते हैं. मंजू जायसवाल की कोशिश कुछ ऐसी ही है.

Dinesh Kumar Purwar

Editor, Pramodan News

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