भारतीय ज्ञान परंपरा का शिक्षा,जीवनशैली एवं समाजिक ब्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान है-आई. पी. मिश्रा
श्री शंकराचार्य प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी में प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा पर सेमीनार हुआ आयोजित

भिलाई-प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा केवल आध्यात्मिक या दार्शनिक विचारों तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसमें जीवनशैली, समाज व्यवस्था, पर्यावरण, शिक्षा और मानसिक संतुलन का समग्र दृष्टिकोण शामिल था। आज के समय में यह परंपरा आधुनिक विज्ञान के साथ मिलाकर अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो रही है।ये उद्गार श्री शंकराचार्य प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के कुलाधिपति आई. पी. मिश्रा ने प्राचीन भारतीय ज्ञान,परंपरा, स्वास्थ्य और समाज में योगदान पर विश्व स्वास्थ्य दिवस पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमीनार में व्यक्त किए।
मानव सभ्यता के उदय से लेकर आज तक की परिस्थितियों पर विस्तार से चर्चा की।सेमीनार की समन्वयक डॉ. सोनाली श्रीवास्तव ने जानकारी देते हुए बताया कि विश्वविद्यालय एवं श्री शंकरा इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साईसेज के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित दो दिवसीय यह सेमीनार विधार्थियों, शिक्षकों, अधिकारियों कर्मचारियों के लिए बहुउपयोगी रहा।
मुख्य विषय विशेषज्ञ सुप्रसिद्ध चिकित्सक एवं प्रखर वक्ता डॉ. अंशुमन चौधान थे।उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा समग्र जीवन दृष्टि प्रदान करती है जिसमें स्व समाज, नैतिकता और प्रकृति के बीच संतुलन है। वर्तमान समय में जीवनशैली संबंधी बीमारियों, मानसिक तनाव सामाजिक विघटन के बीच यह परंपरा मानवता को संतुलित और स्वस्थ्य जीवन की दिशा दिखाती है।
उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में आयुर्वेद और योग का महत्व लगातार बढ़ रहा है। आयुर्वेद समग्र स्वास्थ अवधारणा पर आधारित है, जिसमें रोगों के उपचार के साथ-साथ उनकी रोकथाम पर विशेष जोर दिया जाता है।और प्राणायाम के नियमित अभ्यास से शारिरिक क्षमता बढ़ती है, मानसिक तनाव कम होता है तथा प्रतिरोधक मजबूत होती है। ध्यान और माइंडफूलनेस जैसी पद्धतियाँ मानसिक स्वास्थ्य को संतुलित रखने में सहायक सिद्ध हैं।
उन्होंने ऋषि मुनियों के त्याग, तपस्या पर प्रकाश डालते हुए जटाओं के विज्ञान की चर्चा की।वर्तमान समय में बढ़ती मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा तथा तनाव जैसी समस्याओ के समाधान में प्राचीन भारतीय जीवनशैली प्रभावी मानी जा रही है।
विश्वविद्यालय की कुलसचिव डॉ. स्मिता सेलट ने इस आयोजन के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि आज विज्ञान और प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा का समन्वय, स्वस्थ, संतुलित और नैतिक समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
वर्तमान समय में आवश्यकता है कि प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल्यों को दैनिक जीवन और शिक्षा में व्यापक रूप से अपनाया जाए।हमारी राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय ज्ञान परंपरा का समावेश सुदृढ युवा पीढ़ी के निर्माण की दिशा में एक सार्थक मजबूत कदम है।
सेमीनार में विभिन्न वक्ताओं ने भारतीय ज्ञान परंपरा के महत्वपूर्ण योगदान से प्राचीन और वर्तमान परिवेश में आवश्यकता पर अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम में डॉ संदीप श्रीवास्तव, डॉ सुशील चंद्र तिवारी, डॉ श्रुति तिवारी,स्वरणाली दास पॉल सहित बड़ी संख्या में प्राध्यापक, शोध छात्र और विद्यार्थी उपस्थित थे।कार्यक्रम का संचालनं डा. सोनाली श्रीवास्तव ने किया।आभार प्रदर्शन डॉ स्नेह कुमार मेश्राम ने किया।




