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गेस्ट फैकल्टी को हाईकोर्ट से बड़ा झटका, नियमितीकरण की याचिका खारिज

जबलपुर 

मध्यप्रदेश के कॉलेजों में अध्यापन का भार सम्भाल रहे 5000 से ज्यादा गेस्ट फैकल्टी को हाईकोर्ट के फैसले से तगड़ा झटका लगा है। उच्च शिक्षा विभाग द्वारा नियमित नियुक्ति करने की स्थिति में सालों यही अतिथि विद्वान अध्यापन की व्यवस्था संभाल रहे हैं।कॉलेजों में नियमित नियुक्ति की प्रक्रिया के दौरान गेस्ट फैकल्टी ने हाईकोर्ट में याचिका पेश कर नियमितीकरण की मांग की थी।

सेवा के बदले मांगा नियमितीकरण
याचिकाकर्ता अतिथि विद्वानों की याचिका के अनुसार वे एक से दो दशक से स्वीकृत और खाली पदों पर काम कर रहे हैं। नई भर्ती की जगह उन्हें सहायक प्राध्यापक, खेल अधिकारी और ग्रंथपाल के पदों पर नियमित किया जाए।  

गेस्ट फैकल्टी द्वारा याचिका के माध्यम से उच्च शिक्षा विभाग के निर्देश पर फॉलेन आउट किए अतिथि विद्वानों की वापसी की मांग भी कर रहे थे। वहीं सरकार द्वारा नए सिरे से नियमित भर्ती के लिए जारी विज्ञापनों को रद्द करने की भी मांग की गई थी।

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20 साल से कार्यरत होने का दिया था हवाला

याचिका में पन्ना निवासी डॉ. कमल प्रताप सिंह सहित 290 अन्य ने बताया था कि वे पिछले 20 सालों से शासकीय कॉलेजों में कार्यरत हैं। वे यूजीसी के मानकों के अनुसार पढ़ाई और अन्य कार्य कर रहे हैं, लेकिन उन्हें सिर्फ 50 हजार रुपए मानदेय मिलता है।

हर साल 89 दिन का अनुबंध

याचिकाकर्ताओं ने बताया कि उन्हें हर साल 89 दिन के अनुबंध पर रखा जाता है। इसके बाद सेवा समाप्त कर फिर नई प्रक्रिया से नियुक्ति दी जाती है।

राज्य सरकार की ओर से उप महाधिवक्ता स्वप्निल गांगुली ने कोर्ट को बताया कि गेस्ट फैकल्टी को आयु सीमा में छूट, अनुभव के आधार पर वेटेज और 25 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण दिया गया है, ताकि वे नियमित भर्ती में शामिल हो सकें।

नियमित भर्ती प्रक्रिया को बताया वैध

सरकार ने कहा कि सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति एक वैधानिक आयोग के माध्यम से होती है। नियमों के विपरीत कोई भी नियुक्ति असंवैधानिक होगी। कोर्ट ने भी इस तर्क को सही माना।

“फॉलन आउट” नियम को भी सही ठहराया

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में “फॉलन आउट” नियम को वैध बताया। कोर्ट ने कहा कि नियमित भर्ती होने पर गेस्ट फैकल्टी को हटाना कानूनन सही है, क्योंकि यह पद को स्थायी रूप से भरने की प्रक्रिया का हिस्सा है।

कोर्ट के फैसले के मुख्य बिंदु
1. भर्ती प्रक्रिया में अंतर

नियमित भर्ती (1990 के नियमों के तहत) एमपीपीएससी (MPPSC) के माध्यम से होती है। इसका आधार खुली प्रतियोगिता परीक्षा और अखिल भारतीय स्तर है। जबकि अतिथि विद्वानों का चयन केवल पोस्ट ग्रेजुएशन के अंकों के आधार पर मध्य प्रदेश के मूल निवासियों के लिए ही सीमित है।

2. आरक्षण नियमों का पालन नहीं:
नियमित भर्ती में SC, ST, OBC और दिव्यांगों के लिए संवैधानिक आरक्षण लागू होता है। अतिथि विद्वानों की नियुक्ति में ऐसा कोई प्रावधान प्रभावी नहीं।है। अभ्यर्थी को इसमें केवल अतिरिक्त अंक दिए जाते हैं।  

नियमित भर्ती के लिए हटाना गलत नहीं
फैसले के अनुसार यदि किसी पद पर नियमित नियुक्ति या तबादले के कारण अतिथि विद्वान को हटाया जाता है, तो यह गलत नहीं है। नियम स्पष्ट है कि एक अस्थायी कर्मचारी की जगह दूसरा अस्थायी कर्मचारी नहीं रखा जा सकता। जबकि अस्थायी कर्मचारी की जगह स्थायी  कर्मचारी की नियुक्ति सही है।  

जानकारी का अभाव नहीं
सुनवाई पूरी करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अतिथि विद्वानों को नियुक्ति के पहले दिन से इस नियुक्ति की प्रकृति की सारी जानकारी थी।  उनकी नियुक्ति केवल एक शैक्षणिक सत्र के लिए थी इसलिए वे नियमित लाभ के हकदार नहीं होंगे।

उमादेवी केस का हवाला
हाईकोर्ट ने कहा कि 'उमादेवी' केस के लाभ यहां सीधे लागू नहीं होते। प्रोफेसर और लाइब्रेरियन जैसे उच्च शैक्षणिक पदों की योग्यता और कार्य की प्रकृति एक दिहाड़ी मजदूर से पूरी तरह अलग होती है।  

भर्ती विज्ञापन को चुनौती नहीं
अदालत ने कहा कि सरकार को नियमित भर्ती करने का पूरा अधिकार है। अतिथि विद्वान केवल इस आधार पर भर्ती विज्ञापन को चुनौती नहीं दे सकते कि वे लंबे समय से काम कर रहे हैं। यह कहते हुए हाईकोर्ट ने सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया है।

Dinesh Kumar Purwar

Editor, Pramodan News

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