व्यापार जगत

2016 में बनी थी दुनिया की नंबर-1 कार कंपनी, 10 साल बाद अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रही Volkswagen

नई दिल्ली

2016 में फोल्क्सवागन बिक्री के लिहाज से दुनिया की सबस बड़ी कार कंपनी बनी, लेकिन 10 साल बाद कंपनी अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ती दिख रही है.जर्मन शहर वोल्फ्सबुर्ग को फोल्क्सवागन सिटी भी कहा जाता है. 1938 में इस शहर की स्थापना कार फैक्ट्री में काम करने वाले लोगों के इलाके के तौर पर हुई. दुनिया के 10 मशहूर ब्रांड्स इस शहर से कंट्रोल होते हैं. इनमें वोल्क्सवागन, ऑउडी, पोर्शे, स्कोडा, सिएट एंड कुप्रा, बेंटली, लम्बोर्गिनी, डुकाटी (मोटरसाइकिल) और फोल्क्सवागन कर्मशियल व्हीकल्स जैसे ब्रांड हैं. इन सबकी पैरेंट कंपनी फोल्क्सवागन (VW) है। 

2016 में बिक्री के लिहाज से जापानी कार कंपनी टोयोटा को पीछे छोड़ फोल्क्सवागन, एक साल के लिए दुनिया की सबसे बड़ी कार कंपनी बनी तो इस शहर में जश्न था. लेकिन आज वोल्फ्सबुर्ग के ज्यादातर बाशिंदों के माथे पर चिंता के कई बल पड़े हैं। 

25 अगस्त को फोल्क्सवागन के मुख्यालय में करीब 10 हजार कर्मचारियों के सामने कंपनी के सीईओ ऑलिवर ब्लूमे आए. लेबर यूनियन के साथ समझौते के तहत वह 50 हजार नौकरियों में कटौती का एलान पहले ही कर चुके थे. मंगलवार को उन्होंने और 50 हजार नौकरियों को खत्म करने एलान किया. ब्लूमे ने कहा, बहुत मुमकिन है कि "इनमें से आधे बदलाव जर्मनी में होंगे." यानी करीब कटौती की नई लिस्ट में शामिल 25 हजार नौकरियां जर्मनी में जा सकती हैं। 

चीन की इलेक्ट्रिक कारों से मिल रही कड़ी प्रतिस्पर्धा, अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के टैरिफों और यूरोप में VW की कारों की कमजोर मांग का हवाला देते हुए ब्लूमे ने कहा, "जर्मनी में जैसे हम काम करते आए हैं, अगर हम वैसे ही आगे बढ़ेंगे तो हमें हमेशा हर साल 1.5 अरब यूरो के नुकसान का सामना करना होगा. हम पर कार्रवाई का बहुत ज्यादा दबाव है। 

सबसे करारी चोट, कर्मचारियों और तीन कार ब्रांड्स पर
ब्लूमे जब मंच से ये एलान कर रहे थे, तब नीचे मौजूद कर्मचारी, बू….बू….बू…का शोर पैदाकर और सीटियां बजाकर विरोध जता रहे थे. ब्लूमे के भाषण को बार बार नाराजगी की इस लहर से टकराना पड़ा. इसके बावजूद ब्लूमे ने कहा कि कंपनी, अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है. नौकरियां फोल्क्सवागन के 10 कार ब्रांड्स में जाएंगी. लेकिन सबसे करारी चोट VW, आउडी और पोर्शे पर पड़ेगी। 

कर्मचारी यूनियनों का आरोप है कि VW के मैनेजमेंट ने इस ताजा एलान या योजना के बारे में कर्मचारियों को पहले खुद सीधे तौर पर नहीं बताया. यह जानकारियां मीडिया ने दी, तब जाकर कर्मचारियों को बताया गया। 

VW वर्कर्स काउंसिल की चीफ डानिएला कावालो ने इस दौरान मंच से कहा, "बोर्ड पर हमारा भरोसा, खासतौर पर इसके प्रमुख ऑलिवर ब्लूमे पर, क्षतिग्रस्त हो चुका है. आप ऐसे सीईओ के साथ काम नहीं कर सकते जो स्टाफ को ये बताए ही ना कि चल क्या रहा है। 

इस दौरान कई कर्मचारियों का हाथ में ऐसी तख्तियां थीं, जिन पर लिखा था, "अपने बहीखाते हमारी नौकरियों से संतुलित मत करो। 

हंगरी का रुख करती जर्मन कार कंपनियां
अपनी गुणवत्ता के चलते कई दशकों तक "मेड इन जर्मनी" वाली मशीनों ने दुनिया भर में पहचान बनाई. लेकिन दुनिया भर में बीते 10 बरसों में हुए बदलावों के चलते यह पहचान अब संकट में पड़ गई है. मशीनरी के मामले में चीन, कई क्षेत्रों में जर्मनी को कड़ी चुनौती दे रहा है, फिर चाहे बात ड्रिल मशीन की हो या इलेक्ट्रिक कारों या क्रेनों की। 

चीनी कंपनी बीवाईडी की इलेक्ट्रिक कारें जर्मनी में करीब 20,000 यूरो की रेंज से शुरू होती हैं. सबसे सस्ते मॉडलों की रेंज भी 220 से 507 किलोमीटर है. बोनस या एक्सचेंज ऑफरों के साथ बीवाईडी की कुछ इलेक्ट्रिक कारें 13,000 यूरो की मिल रही हैं. जर्मन कार कंपनियां इस कीमत का मुकाबला नहीं कर पा रही हैं। 

बीएमडब्ल्यू और मर्सिडीज जैसी नामी कंपनियों की हालत भी नाजुक ही है. 2025 में बीएमडब्ल्यू ने हंगरी में एक नया कार प्लांट खोला. यह प्लांट लागत घटाने के इरादे से खोला गया है. जुलाई 2026 में मर्सिडीज ने भी हंगरी में अपने प्लांट का विस्तार कर उसे अपना सबसे बड़ा यूरोपीय प्लांट बना दिया है. मर्सिडीज के सीईओ ओला काएलेनियुस के मुताबिक हंगरी में जर्मनी के मुकाबले 70 फीसदी कम लागत आ रही है। 

फोल्क्सवागन बोर्ड की अगली बैठक अब सितंबर में होनी है, तब पता चलेगा कि 1938 में वोल्फ्सबुर्ग में पहली कार लॉन्च करने वाली VW, 2038 कितनी मजबूती से अपने जमीन पर खड़ी रह पाएगी। 

Dinesh Kumar Purwar

Editor, Pramodan News

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