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कृत्रिम बुद्धिमत्ता मानव मस्तिष्क और संवेदना का विकल्प नहीं : विशेषज्ञ

कृत्रिम बुद्धिमत्ता मानव मस्तिष्क और संवेदना का विकल्प नहीं : विशेषज्ञ

* कृत्रिम बुद्धिमत्ता और भविष्य की चुनौतियों पर वैचारिक विमर्श के साथ काव्य गोष्ठी का आयोजन

रायपुर
नव छत्ती
सगढ़ साहित्य सांस्कृतिक संस्थान, रायपुर के तत्वावधान में सोमवार को रायपुर के वृंदावन सभागार में ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता और भविष्य की चुनौतियां’ विषय पर वैचारिक विमर्श एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में साहित्यकारों, कवियों और साहित्यप्रेमियों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते प्रभाव, संभावनाओं, चुनौतियों तथा मानवीय मूल्यों पर विस्तार से विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कवि, लेखक एवं स्तंभकार संजीव कुमार ठाकुर ने की। मुख्य अतिथि के रूप में बेंगलुरु से विशेष रूप से पहुंचे आर्यावर्त के प्रबंध संपादक बिजय कुमार सिंह उपस्थित रहे। विशिष्ट अतिथियों में डॉ. महेंद्र कुमार ठाकुर, व्यंग्यकार एवं ज्योतिष विशेषज्ञ, उपसंचालक जनसंपर्क सौरभ शर्मा, पत्रकारिता महाविद्यालय के प्राचार्य देवाशीष मुखर्जी, कवि सुरेंद्र रावल तथा छत्तीसगढ़ी कवि-गीतकार मीर अली मीर शामिल रहे।
संस्थान के अध्यक्ष डॉ. संजीव ठाकुर ने कहा कि 'कृत्रिम बुद्धिमत्ता विकास की नई दिशा और चुनौतियों की नई राह है।' उन्होंने कहा कि एआई के बढ़ते प्रभाव से घबराने के बजाय उसके उपयोग को समझने और सावधानीपूर्वक अपनाने की आवश्यकता है। मशीन बुद्धिमान हो सकती है, लेकिन वह मानव मस्तिष्क, मानवीय संवेदनाओं और भावनात्मक अनुभवों का विकल्प नहीं बन सकती। तकनीक का उपयोग मानव जीवन को बेहतर बनाने के लिए होना चाहिए, न कि मानवीय संवेदनाओं और रचनात्मकता को कमजोर करने के लिए।
विमर्श के दौरान साहित्य और तकनीक के बदलते संबंधों पर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता शिक्षा, पत्रकारिता, साहित्य, चिकित्सा, उद्योग और अन्य अनेक क्षेत्रों में नई संभावनाएं पैदा कर रही है, लेकिन इसके साथ रोजगार, मौलिकता, रचनात्मकता, सूचना की विश्वसनीयता और मानवीय मूल्यों से जुड़ी चुनौतियां भी सामने आ रही हैं। ऐसे में तकनीकी प्रगति के साथ विवेक, संवेदना और नैतिक जिम्मेदारी का संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
वक्ताओं ने कहा कि एआई मनुष्य की कार्यक्षमता बढ़ाने वाला प्रभावी साधन बन सकता है, लेकिन सृजन के पीछे मौजूद भावनात्मक अनुभव, जीवन की अनुभूति और मानवीय दृष्टि को मशीन पूरी तरह प्रतिस्थापित नहीं कर सकती। साहित्य के क्षेत्र में भी तकनीक सहायक की भूमिका निभा सकती है, लेकिन रचना की आत्मा मानवीय अनुभव और संवेदना से ही आती है।
विचार-विमर्श के पश्चात काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें मंजूषा अग्रवाल, कल्याणी तिवारी, यशवंत कुमार चतुर्वेदी, मीर अली मीर, मन्नू लाल यदु, छबिलाल सोनी, रूनाली चक्रवर्ती, सुषमा प्रेम पटेल, शकुंतला तिवारी, अभिषेक शर्मा, उदयभान सिंह चौहान, भूपेंद्र कुमार शर्मा, यशवंत यदु, जे. एस. उरकरकर, विवेक कुमार एवं प्रिया वर्मा ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। कवियों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता, प्रकृति, देशभक्ति, सामाजिक सरोकार, पारिवारिक रिश्तों और मानवीय संवेदनाओं सहित विभिन्न विषयों को अपनी रचनाओं में स्वर दिया।
मंजूषा अग्रवाल ने शब्द और भाव के संबंध को रेखांकित करते हुए कहा—
'शब्द तभी अमर होते हैं,
जब भाव से निकलते हैं।
कवि तभी चमकते हैं,
जब आँखों से बोलते हैं।'

कल्याणी तिवारी ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के संदर्भ में अपनी रचना प्रस्तुत करते हुए मशीन और मनुष्य के संबंधों पर प्रश्न उठाए—
'मैं यंत्र नहीं, मैं प्रश्न हूँ,
प्रश्न यहाँ है कि तुमने मुझमें बुद्धि भरी।
प्रभावों को कैसे उत्कृष्टता प्रदान करूँ,
नभ से सुने विस्तारों में,
क्या तुम साथ निभाओगी?'
यशवंत कुमार चतुर्वेदी ने सावन की मनोहारी छटा को अपनी कविता में उकेरा—
'सावन की कारी-कारी बदरिया,
रिमझिम-रिमझिम बारिश का पानी।
सावन पुरवाई शोर करे है,
भूली-बिसरी वह कहानी।'
मन्नू लाल यदु ने देशभक्ति से ओत-प्रोत रचना प्रस्तुत करते हुए कहा—
'कठिन लड़ाई लड़के पाएँ भारत की आज़ादी,
मैं धरती के बेटा आहूँ, देश हमर महतारी।' 
छबिलाल सोनी ने बचपन की स्मृतियों और संघर्षों को शब्द देते हुए अपनी रचना में बीते दिनों की तस्वीर प्रस्तुत की—
'याद मुझे हैं दिन बचपन के,

अपना कच्चा वो मकान।
निर्धनता में बीते दिन थे,
आधे थे हर अरमान।
बिना रंग-रोगन की दीवारें,
कमरों में बिछी चटाई थी।
गोबर से लिपा-पोता आँगन,
लगती हमको सुखदायी थी।'
रूनाली चक्रवर्ती ने भाई-बहन के रिश्ते की आत्मीयता और विश्वास को अपनी रचना में अभिव्यक्त किया—
'भाई एक उम्मीद है, आस है,
बहनों की हिम्मत और विश्वास है।
भाई त्याग है, तपस्या है, सेवा है,
बहनों के लिए जीवन भर का रखवाला है।'

सुषमा प्रेम पटेल ने भगवान श्रीकृष्ण और राधा-माधव की भक्ति भावना से ओत-प्रोत रचना प्रस्तुत कर वातावरण को भक्तिमय बना दिया-
'अधरों पर स्थित हास्य सजाकर,
नित लीला सरस रचते हैं।
गोकुल में वह प्यारे कान्हा,
माखन के चोर कहाते हैं।
चंचल चितवन सा आकर्षण,
देख हृदय नित मुस्काते हैं।
राधा-माधव जब मिलते हैं,
सुषमा शुभ दृश्य सजाते हैं।'

विवेक कुमार रहाटगांवकर ने प्रसिद्ध कवि गोपालदास नीरज की कविता का छत्तीसगढ़ी अनुवाद प्रस्तुत किया। उनकी प्रस्तुति में शहर और समाज की बदलती संवेदनाओं तथा मनुष्य के भीतर छिपे भावों को प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त किया गया।
कार्यक्रम का संचालन ऋषभदेव साहू ने किया। काव्य गोष्ठी में उपस्थित रचनाकारों ने अपनी विविध रचनाओं के माध्यम से साहित्य की शक्ति और मानवीय संवेदनाओं की महत्ता को रेखांकित किया। आयोजन के अंत में छबिलाल सोनी ने अतिथियों, साहित्यकारों, कवियों और साहित्यप्रेमियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधुनिक जीवन की महत्वपूर्ण आवश्यकता बन सकती है, लेकिन मानव समाज की संवेदना, सृजनशीलता, विवेक और आत्मीयता को सुरक्षित रखना उतना ही आवश्यक है। एआई मनुष्य की सहायता का माध्यम बन सकता है, मानव मस्तिष्क और मानवीय संवेदनाओं का विकल्प नहीं।

Dinesh Kumar Purwar

Editor, Pramodan News

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