राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय

बांग्लादेशियों के फर्जी पासपोर्ट मामले में 12 अफसर STF के रडार पर, मास्टरमाइंड रियाल के 4 पासपोर्ट मिले

 ग्वालियर
प्रदेश में बांग्लादेशी नागरिकों के फर्जी भारतीय दस्तावेज और पासपोर्ट तैयार करने वाले अंतरराज्यीय रैकेट के खुलासे के बाद हड़कंप मच गया है। स्पेशल टास्क फोर्स (STF) की जांच में भोपाल, ग्वालियर, छिंदवाड़ा, पांढुर्णा और बैतूल के 12 पुलिस अधिकारियों व अन्य विभागों के कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध पाई गई है, जो अब STF की रडार पर हैं। साल 2021 में बांग्लादेशियों के फर्जी पासपोर्ट बनाने का यह खेल ग्वालियर के डबरा से शुरू हुआ था।

17 फर्जी पासपोर्ट्स पर एक ही गवाह, एक ही पता और एक ही मोबाइल नंबर होने के बावजूद पुलिस को भनक तक नहीं लगी, जिससे पुलिस तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। उस समय ग्वालियर डबरा थाना प्रभारी के रूप में विनायक शुक्ला व थाना पर पासपोर्ट वैरीफिकेशन सेल का इंचार्ज प्रधान आरक्षक भूपेन्द्र गुर्जर हुआ करता था। इन दोनों से एसटीएफ जल्द तलब कर पूछताछ करेगी।

विदेश मंत्रालय ने 3 साल पहले (2023 में) PHQ को चेताया था
रैकेट की पैठ भोपाल से डबरा तक फैली हुई थी। विदेश मंत्रालय ने 2023 में ही मध्य प्रदेश पुलिस मुख्यालय (PHQ) को रिपोर्ट भेजकर फर्जी पासपोर्ट बनाए जाने के प्रति आगाह किया था। इसके बाद भी पीएचक्यू से कोई ठोस संदेश जारी नहीं किया गया। जिसका नतीजा यह रहा कि आज इन 70 बांग्लादेशियों के फर्जी दस्तावेज व पासपोर्ट ने पूरे देश की सुरक्षा को खतरे में डाल दिया है।

100 के पार पहुंच सकती है संख्या
प्रदेश में फर्जी पासपोर्ट की संख्या 100 के पार जाने की आशंका है। क्योंकि एसटीएफ को कुछ और भी संदिग्ध पासपोर्ट मिलने की उम्मीद है। साथ ही साल 2021-22 और उसके बाद के दो साल में डबरा सहित इन शहरों से जितने पासपोर्ट बने हैं उनमें कई संदिग्ध की श्रेणी में आ रहे हैं।
एसटीएफ की पांच टीम मध्य प्रदेश के बाहर दबिश दे रही हैं।
रैकेट का मुख्य नेटवर्क ग्वालियर और भोपाल में सक्रिय था। भोपाल के गोविंदपुरा के एक ही पते पर 40 फर्जी पासपोर्ट के आवेदन तैयार कर अलग-अलग जिलों के पासपोर्ट सेल में वेरिफिकेशन के लिए भेजे जाते रहे और पासपोर्ट बनते रहे। इसी तरह दूसरा सबसे बड़ा गढ़ ग्वालियर का डबरा रहा था। यहां से एक ही पते पर 17 बांग्लादेशियों के भारतीय दस्तावेज बने और पासपोर्ट तैयार हुए।

आवेदन आने से पहले ही थाने में बजती थी घंटी- 'अर्जेंट है, जल्दी निकालो'
स्पेशल टास्क फोर्स की जांच में खुलासा हुआ है कि संदिग्ध पासपोर्ट आवेदन वेरिफिकेशन के लिए डबरा थाने पहुंचने से पहले ही वहां फोन आ जाता था। थाने में कहा जाता था आवेदन अर्जेंट है, इसे जल्दी क्लियर करके निकालो। एक फोन कॉल पर पासपोर्ट आनन-फानन में वैरिफिकेशन कर निकाल दिया जाता था।

अब तक यह चार पकड़े गए
बांग्लादेशियों के मध्य प्रदेश से फर्जी पासपोर्ट कांड में मास्टर माइंड रियाल चौधरी, जाय चौधरी बरुआ, महाराष्ट्र के उल्लासनगर से पकड़ा गया प्रियान राय और विप्लव अधिकारी को साउथ दिल्ली से पकड़ा था। अब तक यह चार पकड़े गए हैं। जबकि 08 की तलाश में एसटीएफ की अलग-अलग टीम दबिश दे रही हैं।

जांच के घेरे में तत्कालीन TI व आरक्षक
जिस अवधि (2021) में डबरा से ये फर्जी पासपोर्ट वेरीफाई हुए, उस दौरान विनायक शुक्ला (वर्तमान में दतिया में DSP) डबरा थाना प्रभारी थे, जबकि पासपोर्ट वेरिफिकेशन सेल का जिम्मा प्रधान आरक्षक भूपेंद्र गुर्जर के पास था। कुछ समय के लिए सुरेंद्र सिंह भी थाना प्रभारी रहे। STF यह पता लगा रही है कि थाने में पहले से फोन कौन करता था और उसे आवेदनों की गुप्त जानकारी कैसे मिलती थी।

मास्टरमाइंड रियाल चौधरी के खुद के बने थे 4 फर्जी पासपोर्ट
एसटीएफ और पुलिस की पूछताछ में रैकेट के मास्टरमाइंड रियाल चौधरी को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। रियाल चौधरी के खुद के 4 पासपोर्ट बने हैं और चारों में ही फर्जी दस्तावेज लगाए गए थे। उसने डबरा के दो स्थानीय दलालों के जरिए फर्जी दस्तावेज तैयार करवाए थे। एसपी राजेश भदौरिया के अनुसार, रियाल से पूछताछ के आधार पर 5 अलग-अलग टीमें गठित कर संभावित ठिकानों पर छापेमारी के लिए भेजी गई हैं।

बौद्ध विहार के एक भिक्षु के तीन अलग-अलग नाम आए थे सामने
बांग्लादेशियों के फर्जी भारतीय पासपोर्ट बनाने के मामले में खुलासा हुआ है। डबरा के जिस बुद्ध विहार के पते से 17 बांग्लादेशियों के भारतीय पासपोर्ट बने, वहां के भिक्षु के ही तीन अलग-अलग नाम सामने आए हैं। आधार कार्ड में नाम रामेश्वर जाटव, वोटर आईडी में भंते संघप्रिय और मठ की दीवार पर रांघप्रिय महाथेरो लिखा है। आधार में रामेश्वर जाटव के पिता का नाम नारायण जाटव और पता दतिया का है। वहीं वोटर आईडी में उनका नाम भंते संघप्रिय और पिता का नाम नारायण दर्ज है। इस पर उनका कहना है कि कुछ दिन पहले ही बौद्ध धर्म अपनाया है। धर्म अपनाने के बाद नाम संघप्रिय रखा गया। इस पर कुछ नहीं कहा कि नया नाम मिलने पर क्या दस्तावेज भी बदल जाते हैं।

मठों में कौन आया और कौन गया…
बौद्ध मठ का कोई रिकॉर्ड ही नहीं, इसलिए अब वह जांच के घेरे में हैं। STF की जांच में एक और गंभीर बात सामने आई है। बुद्ध मठों में आने-जाने वाले लोगों का कोई व्यवस्थित रिकॉर्ड नहीं मिला है। मठ में कौन आया, कहां से आया, कितने दिन रुका और कब चला गया, इसका हिसाब नहीं है। संदेह के आधार पर मठों की भूमिका भी जांच के दायरे में है।

एमपी के बाहर दबिश दे रहीं पांच टीम
इस मामले में एसटीएफ एसपी राजेश सिंह भदौरिया ने बताया कि फर्जी पासपोर्ट मामले में हमारी पांच टीम मध्यप्रदेश के बाहर दबिश दे रही हैं। साथ ही पांच साल में फर्जी तरीके से भारतीय दस्तावेज बनाने से लेकर पासपोर्ट वैरीफिकेशन तक कई विभागों और पुलिस थानों तक यह फाइल पहुंचीं। इनसे जुड़े पुलिस अफसर, पुलिसकर्मी व अन्य विभाग के कर्मचारियों की सूची बनाई है। सभी हमारी जांच के दायरे में हैं और उनसे पूछताछ की जाएगी। कई आरोपियों के दो से तीन दस्तावेज भी मिले हैं।

Dinesh Kumar Purwar

Editor, Pramodan News

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