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झारखंड के मॉडल स्कूलों में 65% सीटें खाली, अब स्थानीय स्तर पर होगा एडमिशन

रांची.

राज्य के माॅडल स्कूलों में नामांकन व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। प्रवेश परीक्षा के परिणाम में हुई लंबी देरी और बेहद कम सफलता प्रतिशत के कारण इस बार भी हजारों बच्चों का अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई का सपना अधूरा रह गया। इस वर्ष माॅडल स्कूल प्रवेश परीक्षा में 3479 परीक्षार्थी शामिल हुए, लेकिन मात्र 1165 छात्र-छात्राएं ही सफल हो सके।

यानी करीब 35 प्रतिशत अभ्यर्थी ही परीक्षा पास कर पाए, जबकि लगभग 65 प्रतिशत सीटें खाली रह गई। जिसके बाद झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद (जेईपीसी) ने भी पूरी स्थिति पर खेद जताया है। परिषद अब इस व्यवस्था में बदलाव के संकेत भी दिए हैं। अगले सत्र से प्रवेश परीक्षा का आयोजन खुद जेईपीसी कराने की तैयारी में जुट गया है। ताकि परिणाम और नामांकन प्रक्रिया सरल कर समय पर पूरी की जा सके। जैक द्वारा जारी परिणाम के अनुसार इस वर्ष माॅडल स्कूल प्रवेश परीक्षा में 3479 परीक्षार्थी शामिल हुए, लेकिन मात्र 1165 छात्र-छात्राएं ही सफल हो सके।

यानी करीब 35 प्रतिशत अभ्यर्थी ही परीक्षा पास कर पाए, जबकि लगभग 65 प्रतिशत सीटें खाली रहने की आशंका पैदा हो गई है। पूरे राज्य में माॅडल स्कूलों में लगभग 3280 सीटें उपलब्ध हैं। ऐसे में अब अधिकांश स्कूलों में नामांकन के बावजूद सीटें रिक्त रह सकती हैं। दूसरी ओर अप्रैल माह तक छात्र-छात्राएं परिणाम का इंतजार करते रहे, जबकि अधिकतर निजी और सरकारी स्कूलों में नामांकन प्रक्रिया लगभग समाप्त हो चुकी थी। अब जब झारखंड एकेडमिक काउंसिल (जैक) ने माॅडल स्कूल परीक्षा 2026 का परिणाम जारी किया है तो स्थिति और चिंताजनक हो गई है।

अब स्थानीय स्तर पर भरी जाएंगी सीटें
माॅडल स्कूल प्रभाग प्रभारी धीरसेन ए. सोरेंग ने बताया कि खाली सीटों को अब स्थानीय स्तर पर भरने का प्रयास किया जाएगा। उन्होंने स्वीकार किया कि इस बार भी परिणाम में देरी से सत्र प्रभावित होगा। हालांकि नामांकन पूरा होने के बाद छात्रों के लिए अतिरिक्त कक्षाओं की व्यवस्था की जाएगी ताकि पाठ्यक्रम समय पर पूरा कराया जा सके। उन्होंने कहा कि माॅडल स्कूल की वर्तमान नामांकन नीति में बदलाव की जरूरत है। यह योजना मूल रूप से केंद्र सरकार की थी, लेकिन बाद में केंद्र सरकार ने इससे हाथ खींच लिया। अब राज्य सरकार इन स्कूलों का संचालन कर रही है, लेकिन पुरानी नीति ही लागू है। ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों के लिए आनलाइन प्रवेश परीक्षा अभी भी चुनौती बनी हुई है। डिजिटल संसाधनों और अंग्रेजी माध्यम की तैयारी के अभाव में बड़ी संख्या में बच्चे सफल नहीं हो पा रहे हैं।

रिजल्ट में देरी से बढ़ी परेशानी
प्रवेश परीक्षा आयोजित होने के बाद महीनों तक परिणाम जारी नहीं होने से अभिभावकों में असमंजस की स्थिति बनी रही। कई अभिभावक इस उम्मीद में बच्चों का अन्य स्कूलों में नामांकन नहीं करा सके कि माडल स्कूल का परिणाम जल्द जारी होगा। लेकिन अप्रैल समाप्त होने के बाद परिणाम आने से अब उनके सामने विकल्प सीमित हो गए हैं।
आर्थिक रूप से कमजोर और ग्रामीण क्षेत्रों के अभिभावकों के लिए माडल स्कूल कम खर्च में अंग्रेजी माध्यम की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का सबसे बड़ा विकल्प माने जाते हैं। लेकिन समय पर नामांकन प्रक्रिया पूरी नहीं होने से अब कई बच्चों को सामान्य सरकारी स्कूलों का रुख करना पड़ सकता है।

पिछले वर्ष भी खाली रह गई थीं सीटें
यह पहला अवसर नहीं है जब माडल स्कूलों में नामांकन प्रभावित हुआ हो। पिछले वर्ष भी अगस्त-सितंबर तक नामांकन प्रक्रिया चलती रही थी, जिसके कारण करीब 30 प्रतिशत सीटें खाली रह गई थीं। इस बार स्थिति और गंभीर दिखाई दे रही है। राज्य के 82 माडल स्कूलों में नए सत्र की तैयारी लगभग पूरी हो चुकी है। कई स्कूलों में एनसीईआरटी की पुस्तकें पहुंच चुकी हैं और शिक्षकों की तैनाती भी कर दी गई है। राजधानी रांची में आठ माडल स्कूल संचालित हैं, जहां अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई की सुविधा उपलब्ध है। हालांकि कई स्कूल अभी भी आधारभूत सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं।

क्या है माॅडल स्कूल योजना
माॅडल स्कूलों की स्थापना ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के प्रतिभाशाली बच्चों को छठी कक्षा में गुणवत्तापूर्ण अंग्रेजी माध्यम शिक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से की गई थी। इन स्कूलों में एनसीईआरटी पाठ्यक्रम, प्रशिक्षित शिक्षक और आधुनिक शिक्षण व्यवस्था उपलब्ध कराने की परिकल्पना की गई थी, ताकि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चे भी निजी स्कूलों जैसी शिक्षा प्राप्त कर सकें। जहां कम खर्च में अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा मिलती है।

Dinesh Kumar Purwar

Editor, Pramodan News

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