राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय

ज्ञानवापी केस से जुड़े जज रवि कुमार दिवाकर चर्चा में, 3 महीने में 13 दोषियों को सुनाई फांसी की सजा

 मुजफ्फरनगर 

ज्ञानवापी प्रकरण में अपने फैसले को लेकर देशभर में चर्चा में रहे जज रवि कुमार दिवाकर एक बार फिर सुर्खियों में हैं. इस बार वजह उनके हालिया आपराधिक मामलों में दिए गए फैसले हैं. बीते 6 अप्रैल से 6 जुलाई 2026 के बीच उन्होंने मुजफ्फरनगर में विभिन्न हत्या के मामलों में 13 दोषियों को मृत्युदंड (फांसी की सजा) सुनाई है. लगातार आए इन फैसलों ने न्यायिक हलकों के साथ-साथ आम लोगों के बीच भी चर्चा छेड़ दी है। 

लगभग तीन महीने की अवधि में अलग-अलग हत्याकांडों में सुनाए गए इन फैसलों को लेकर अभियोजन पक्ष का कहना है कि इससे पीड़ित परिवारों को न्याय मिला है और गंभीर अपराधों के खिलाफ सख्त संदेश गया है. हालांकि, यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारतीय न्याय व्यवस्था में मृत्युदंड की सजा अंतिम नहीं होती. ऐसे मामलों में दोषियों को उच्च न्यायालय में अपील का अधिकार होता है और फांसी की सजा पर अमल से पहले उच्च न्यायालय की पुष्टि आवश्यक होती है। 

 इन मामलों में सुनाई गई मृत्युदंड की सजा

6 अप्रैल 2026: अधिवक्ता समीर सैफी हत्याकांड में अदालत ने सिंगोल अल्वी, सोनू उर्फ रिजवान और शालू उर्फ अरबाज को मृत्युदंड सुनाया.

28 अप्रैल 2026 : शेखर हत्याकांड में मुकेश और उसके तीन बेटों प्रदीप, संदीप और सोनू को फांसी की सजा सुनाई गई.

30 मई 2026: राजेश देवी हत्याकांड में आरोपी रईस को मृत्युदंड दिया गया.

20 जून 2026: राजेंद्र सैनी हत्याकांड में रामकरण उर्फ सावन गिरी और गीलू को फांसी की सजा सुनाई गई.

2 जुलाई 2026: होमगार्ड रतिराम हत्याकांड में आरोपी दीपक को मृत्युदंड दिया गया. 

6 जुलाई 2026: राजबीर सिंह हत्याकांड में पूर्व प्रधान प्रमोद कुमार और सहदेव उर्फ पप्पू को फांसी की सजा सुनाई गई.

अभियोजन पक्ष ने क्या कहा
मुजफ्फरनगर के जिला शासकीय अधिवक्ता (डीजीसी) राजीव शर्मा का कहना है कि अदालत के इन फैसलों से पीड़ित परिवारों को न्याय मिलने का भरोसा मजबूत हुआ है. उनके अनुसार, कठोर सजा से गंभीर अपराधों के प्रति समाज में स्पष्ट संदेश जाता है और कानून का भय भी बना रहता है। 

क्यों चर्चा में हैं ये फैसले?
एक ही न्यायाधीश द्वारा कम समय में कई चर्चित हत्या मामलों में मृत्युदंड सुनाए जाने के कारण ये फैसले व्यापक चर्चा का विषय बने हुए हैं. कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि हर मामले में अदालत उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहों और कानून के आधार पर स्वतंत्र रूप से फैसला सुनाती है. वहीं, अंतिम कानूनी प्रक्रिया पूरी होने तक दोषियों को अपील सहित सभी संवैधानिक अधिकार प्राप्त रहते हैं. फिलहाल, न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर के ये फैसले मुजफ्फरनगर की न्यायिक कार्यवाही में महत्वपूर्ण घटनाक्रम के रूप में देखे जा रहे हैं और इन पर कानूनी तथा सामाजिक स्तर पर लगातार चर्चा जारी है। 

16 साल बाद मिला इंसाफ 
16 साल बाद एक किसान की हत्या के मामले में पूर्व प्रधान सहित दो अभियुक्तों को फांसी की सजा सुनाते हुए एक- एक लाख रुपये का भी जुर्माना लगाया है. दरसअल तितावी थाना क्षेत्र के मांडी गांव में प्रधानी चुनाव की रंजिश के चलते 16 साल पूर्व 24 अगस्त 2010 को किसान राजबीर सिंह की उस समय गोली मारकर हत्या कर दी गई थी जब वह अपने खेत पर काम कर रहे थे. इस मामले में मृतक किसान राजबीर सिंह के बेटे प्रदीप ने उस समय तितावी थाने में अज्ञात में मुकदमा दर्ज कराया था. जिसके चलते विवेचना के दौरान इस हत्या में गांव के ही सहदेव, प्रमोद, अमित और विपिन शर्मा के नाम प्रकाश में आए थे. लेकिन इस मामले में जहाँ ट्रायल के दौरान अमित और विपिन शर्मा नाम के दो अभियुक्त की पुलिस मुठभेड़ के दौरान मौत हो चुकी है तो वही आज जनपद की फास्ट ट्रैक ने इस मामले में 16 साल बाद फैसला सुनाते हुए अभियुक्त सहदेव और प्रमोद को मृत्युदंड की सजा सुनाई है साथ ही न्यायालय ने दोनों अभियुक्तों पर एक एक लाख रुपए का आर्थिक दंड भी लगाया है. जिसके बाद दोनों अभियुक्तों को पुलिस अभिरक्षा में न्यायालय द्वारा जेल भेज दिया गया है। 

Dinesh Kumar Purwar

Editor, Pramodan News

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