राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय

होर्मुज में जंग का असर, स्वेज पर चीन की नजर! Xi Jinping के मिस्र दौरे से बदल रहा मिडिल ईस्ट का पावर मैप

वाशिंगटन

एक तरफ होर्मुज की खाड़ी में अमेरिका और ईरान की जंग एक बार फिर से तेज हो चुकी है, तो दूसरी तरफ चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग मिस्र पहुंच गए हैं. यह दौरा देखने में सामान्य कूटनीतिक यात्रा लगता है, लेकिन इसका समय बहुत मायने रखता है. जिस वक्त होर्मुज का समुद्री रास्ता युद्ध की वजह से बुरी तरह प्रभावित है, ठीक उसी वक्त चीन मिस्र के साथ अपने रिश्ते और मजबूत कर रहा है, जिसके हाथ में दुनिया के सबसे अहम व्यापारिक रास्तों में से एक, यानी स्वेज कैनाल है। 

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक होर्मुज में जहाजों की आवाजाही तेजी से घटी है. मंगलवार को सिर्फ चार मालवाहक जहाज इस रास्ते से गुजरे, जबकि पिछले दस दिनों का औसत करीब तेरह जहाजों का था. सामान्य दिनों में दुनिया का लगभग बीस फीसदी तेल व्यापार इसी रास्ते से होकर गुजरता है. लेकिन ईरान और अमेरिका के बीच टकराव और टैंकरों पर हमलों ने इस रूट को बेहद असुरक्षित बना दिया है। 

ठीक इसी समय शी जिनपिंग काहिरा में हैं. चीन के राष्ट्रपति करीब एक दशक बाद मिस्र पहुंचे हैं. यह सिर्फ पुरानी दोस्ती निभाने की यात्रा नहीं है. मिस्र लंबे समय से अमेरिका का करीबी रणनीतिक साथी रहा है, लेकिन बीते कुछ सालों में काहिरा ने बीजिंग, मॉस्को और दूसरी ताकतों के साथ भी अपने संबंध तेजी से बढ़ाए हैं. रॉयटर्स के मुताबिक चीन और मिस्र के बीच व्यापार करीब इक्कीस अरब डॉलर तक पहुंच चुका है, और स्वेज कैनाल आर्थिक क्षेत्र समेत कई क्षेत्रों में चीनी निवेश बढ़ रहा है। 

यही इस दौरे की सबसे बड़ी कहानी है. अमेरिका जहां मिडिल ईस्ट में सैन्य ताकत के जरिए ईरान को रोकने में जुटा है, वहीं चीन उसी इलाके में निवेश, इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स, कूटनीति और साझेदारियों के जरिए अपना असर बढ़ा रहा है. मिस्र के पास स्वेज कैनाल है, जो एशिया, मिडिल ईस्ट और यूरोप को जोड़ता है. होर्मुज में बाधा के बीच स्वेज ऊर्जा आपूर्ति का एक अहम विकल्प बनकर उभरा है। 

इसी बीच अगस्त में चीन और मिस्र ने पहली बार संयुक्त हवाई अभ्यास भी किया, जिसमें चीनी J-16 और मिस्री राफेल लड़ाकू विमानों ने साथ उड़ान भरी. अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक यह दिखाता है कि अब चीन-मिस्र संबंध सिर्फ सड़कों और फैक्ट्रियों तक सीमित नहीं रहे। 

मिस्र अरब जगत का बड़ा केंद्र है, अफ्रीका का प्रवेश द्वार है और ब्रिक्स का सदस्य भी है. शी जिनपिंग मिस्र को मिडिल ईस्ट और अफ्रीका दोनों में अपना प्रभाव बढ़ाने के आधार के तौर पर देख रहे हैं. इससे पहले बीजिंग ईरान और सऊदी अरब के बीच बातचीत करवाकर भी मध्यस्थ की छवि बनाने की कोशिश कर चुका है। 

रॉयटर्स के अनुसार, काहिरा अमेरिकी सैन्य मदद के साथ साथ चीन, रूस और यूरोप के साथ भी अपने विकल्प बढ़ा रहा है. इसका मतलब यह नहीं कि चीन ने मिडिल ईस्ट में अमेरिका की जगह ले ली है, लेकिन तस्वीर बदल जरूर रही है। 

भारत के लिए भी यह घटनाक्रम अहम है. होर्मुज भारत की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा है, जबकि स्वेज भारत के यूरोप व्यापार के लिए जरूरी है. अगर ये समुद्री रास्ते लंबे समय तक अस्थिर रहते हैं, तो इसका असर कच्चे तेल की कीमतों, माल भाड़े और आम उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है. ऐसे में अमेरिका के साथ रिश्ते बनाए रखते हुए चीन से मुकाबला और रूस के साथ संतुलन बनाना भारत के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। 

Dinesh Kumar Purwar

Editor, Pramodan News

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