राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय

टैगोर नाट्य महोत्सव के तीसरे दिन ‘संभव’ आर्ट ग्रुप, दिल्ली ने किया संतोष चौबे की दो चर्चित कहानियों का मंचन

भोपाल।

 टैगोर नाट्य महोत्सव के तीसरे दिन मंगलवार को रवीन्द्र भवन में कथाकार संतोष चौबे की दो चर्चित कहानियों ‘उनके हिस्से का प्रेम’ और ‘लेखक बनाने वाले’ का प्रभावशाली मंचन किया गया। प्रख्यात रंग निर्देशक देवेन्द्र राज अंकुर के निर्देशन में हुई इन प्रस्तुतियों को दिल्ली के ‘संभव’ आर्ट ग्रुप ने मंच पर साकार किया। इसके अलावा कार्यक्रम में रंगसंवाद पत्रिका का विमोचन भी किया गया। वहीं मंच का संचालन अविजित सोलंकी ने किया। आयोजन टैगोर नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा, विश्वरंग फाउंडेशन और रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में किया जा रहा है। 
पहली प्रस्तुति ‘उनके हिस्से का प्रेम’ में एक संस्थान के बॉस के प्रेम संबंधों को अनूठे रंगमंचीय प्रयोग के माध्यम से सामने लाया गया। कहानी में ऑफिस की मेज, कलम, शीशा, कुर्सी और डायरी जैसे निर्जीव दिखाई देने वाले उपकरण उसके प्रेम संबंधों के साक्षी और पड़ताल करने वाले पात्रों की तरह उभरते हैं। इन वस्तुओं के माध्यम से बॉस के आधे-अधूरे प्रेम संबंधों की कहानी जिस तरह दर्शकों के सामने आती है, वह प्रस्तुति का विशेष आकर्षण रही।

दूसरी प्रस्तुति ‘लेखक बनाने वाले’ में लेखकीय महत्वाकांक्षा और उसके बाजारू दोहन पर व्यंग्य किया गया। कहानी का मुख्य पात्र बैंक में नौकरी करने वाला व्यक्ति है, जो लिखता रहता है और लेखक बनने की इच्छा रखता है। अखबार में दिल्ली के एक ‘लेखक बनाओ केंद्र’ का विज्ञापन देखकर वह वहां पहुंचता है। केंद्र उससे पैसे लेकर उसकी एक सामान्य कविता को तैयार करवाने और उसकी झूठी प्रशंसा करने का प्रयास करता है। इस अनुभव से निराश और आक्रोशित होकर वह वहां से लौटता है और महसूस करता है कि लेखक बनाने के नाम पर ऐसे केंद्र लोगों की भावनाओं और लेखकीय आकांक्षा को पैसा कमाने का जरिया बना रहे हैं। कहानी इसी विडंबना और धोखे को व्यंग्यात्मक ढंग से सामने रखती है।

दोनों प्रस्तुतियों में संतोष चौबे की कहानियों की विशिष्ट संवेदना और व्यंग्य को देवेन्द्र राज अंकुर की रंगमंचीय दृष्टि के माध्यम से प्रभावी रूप में प्रस्तुत किया गया। वस्तुओं को कथानक का हिस्सा बनाना और सामान्य जीवन की स्थितियों के भीतर छिपे सामाजिक द्वंद्व को मंच पर उभारना इन प्रस्तुतियों की खास विशेषता रही।

कवि, कथाकार और उपन्यासकार संतोष चौबे हिंदी के उन विरल साहित्यकारों में हैं, जो साहित्य और विज्ञान दोनों क्षेत्रों में समान रूप से सक्रिय रहे हैं। उनके छह कथा-संग्रह—‘हल्के रंग की कमीज’, ‘रेस्त्रां में दोपहर’, ‘नौ बिंदुओं का खेल’, ‘बीच प्रेम में गांधी’, ‘प्रतिनिधि कहानियां’ तथा ‘मगर शेक्सपियर को याद रखना’—और चार उपन्यास—‘राग केदार’, ‘क्या पता कामरेड मोहन’, ‘जल तरंग’ तथा ‘सपनों की दुनिया में ब्लेकहोल’—प्रकाशित एवं चर्चित हैं। उनके कविता-संग्रहों में ‘कहीं और सच होंगे सपने’, ‘कोना धरती का’, ‘इस अ-कवि समय में’ और ‘घर बाहर’ शामिल हैं। उनकी कहानियों का मंचन भारत भवन और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली सहित विभिन्न मंचों पर हो चुका है तथा उनकी रचनाएं देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर तथा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से निर्देशन में विशेषज्ञता प्राप्त देवेन्द्र राज अंकुर देशभर की अनेक व्यावसायिक एवं शौकिया नाट्य मंडलियों के साथ निर्देशन कर चुके हैं। ‘संभव’ ग्रुप के संस्थापक सदस्य और ‘कहानी का रंगमंच’ के प्रणेता अंकुर अध्यापक, कैंप निर्देशक और नाट्य निर्देशक के रूप में देशभर की कार्यशालाओं से जुड़े रहे हैं। उन्होंने विभिन्न भाषाओं के नाटकों का हिंदी में अनुवाद किया है और रंगमंच विषयक लेखन भी किया है। रंग आलोचना पर उनकी सात से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं। टैगोर फेलोशिप प्राप्त प्रो. अंकुर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक रह चुके हैं। रंगमंच के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए उन्हें संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
मंच पर

अमिताभ श्रीवास्तव, अमित सक्सेना, प्रकाश झा, गौरी देवल, रचिता वर्मा एवं सहज हरजाई

 

Dinesh Kumar Purwar

Editor, Pramodan News

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button