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यूपी में महिला वोटरों पर फोकस, योगी सरकार का ‘लखटकिया’ दांव

लखनऊ 
उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक नई हवा बह रही है. 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ा और निर्णायक मोहरा बनकर उभरी हैं राज्य की महिला वोटर. योगी सरकार ने उत्तर प्रदेश महिला उद्यमी क्रेडिट योजना के जरिए सीधे 1 करोड़ महिलाओं को साधने की एक ऐसी रणनीति तैयार की है, जिसने सूबे के चुनावी माहौल में गर्मी बढ़ा दी है. जब सीधे महिलाओं के खाते में ब्याजमुक्त एक लाख रुपए पहुंचेंगे तो बीजेपी को उसी जादू के दोहराने की उम्मीद है, जो पिछले साल बिहार चुनाव में देखा गया। 

उत्तर प्रदेश में पहले से ही कानून-व्यवस्था, एंटी-रोमियो स्क्वाड और सेफ सिटी प्रोजेक्ट्स की वजह से योगी आदित्यनाथ को महिला वोटरों का मजबूत समर्थन मिलता रहा है. लेकिन इस बार बात सिर्फ सुरक्षा तक सीमित नहीं है. अब मुकाबला आर्थिक स्वावलंबन और आधी आबादी की जेब को सीधे राहत पहुंचाने का है. इस नए राजनीतिक दांव को उस समय के साथ जोड़कर देखा जा रहा है जब बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के जरिए एक बड़ा कार्ड खेला था. अब सवाल यह है कि क्या बिहार का वही फॉर्मूला यूपी की सरजमीं पर भी कमाल दिखाएगा?

आधी आबादी को साधने की यह होड़ अचानक तेज नहीं हुई है. विपक्ष की तरफ से समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव लगातार अपनी पत्नी और सांसद डिंपल यादव को आगे करके महिला वोटरों के बीच अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसे में योगी आदित्यनाथ का यह मास्टरस्ट्रोक उनके सबसे मजबूत वोटबैंक की नींव को और ज्यादा पक्का करने की ठोस कोशिश माना जा रहा है. हालांकि, योगी आदित्यनाथ और बीजेपी को महिलाओं का एकतरफ समर्थन हासिल रहा है, जिसकी एक झलक 2022 के यूपी चुनाव नतीजों में देखी गई. जहां बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच पुरुषों के वोट प्रतिशत में तो महज 4 फीसदी का अंतर था, लेकिन महिला वोटरों ने योगी के पक्ष में बंपर मतदान किया. बीजेपी को 48 फीसदी महिला वोट मिले थे, जबकि सपा को महज 32 फीसदी। 

बिहार का वो सबक, जिसने बदल दी सियासत की दिशा
यूपी और बिहार की जातिगत पॉलिटिक्स कमोबेश एक जैसी ही है. और पेंचीदा भी. जिसमें गारंटी कम, रिस्क ज्यादा है. जातियों को अपने पक्ष में साधने की हर पार्टी कोशिश करती है. ऐसे में बीजेपी ने कई राज्यों में महिला वोटरों के रूप में एक स्थायी वोटबैंक कायम किया है। 

बिहार के विधानसभा चुनाव 2025 में मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना एक ऐसा पासा साबित हुई थी, जिसने पूरे चुनाव का रुख बदल दिया. चुनाव की आहट के साथ ही राज्य के हर परिवार की एक महिला को सीधे बैंक खाते में आर्थिक मदद और रोजगार शुरू करने का ऑफर दिया गया. इस योजना ने सीधे तौर पर गांव-गांव की महिलाओं को सरकार से जोड़ा और जब नतीजे आए तो यह साफ दिखा कि महिला वोट बैंक किस तरह किसी भी दल की किस्मत पलटने का माद्दा रखता है। 

बिहार के इस सफल मॉडल ने यह साबित कर दिया कि जब महिलाओं को सीधे आर्थिक रूप से सशक्त किया जाता है, तो वे मतदान केंद्र तक जाकर अपनी पसंद जाहिर करने में जरा भी नहीं हिचकतीं. यही वजह है कि यूपी के चुनावी मौसम से ठीक पहले योगी सरकार ने भी इसी राह पर तेजी से कदम आगे बढ़ाए हैं। 

यूपी की योजना: 1 करोड़ महिलाओं को 1 लाख रुपए का बड़ा आधार
योगी सरकार की 'महिला उद्यमी क्रेडिट योजना' का ढांचा इस तरह तैयार किया गया है कि इसका असर सीधा और व्यापक हो. योजना के तहत उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़ी करीब 1 करोड़ महिलाओं को 1 लाख रुपए तक का ब्याजमुक्त क्रेडिट उपलब्ध कराने की पूरी तैयारी है। 

इस योजना की सबसे बड़ी ताकत इसका आसान और पारदर्शी तरीका है. महिलाओं को बिना किसी ब्याज के तीन किस्तों में पैसे दिए जाएंगे. पहली किस्त 20,000 रुपए की होगी, जिसे दिसंबर से वितरित करने की तैयारी है. इसके बाद समय पर भुगतान करने वाली महिलाओं को 30,000 रुपए और फिर 50,000 रुपए की तीसरी किस्त मिलेगी. यानी कोई कागजी उलझन नहीं, कोई ब्याज का बोझ नहीं और सीधे बैंक खाते में मदद। 

दोनों योजनाओं में क्या है समानता और क्या है नयापन?
बिहार की तरह यूपी की योजना का नारा भी वही है- आधी आबादी को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना। 

समानता की बात करें तो दोनों ही योजनाओं में सरकार की मंशा किसी बिचौलिए के बिना सीधे महिलाओं तक पैसा पहुंचाने की है. दोनों जगहों पर डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) का सहारा लिया गया है ताकि एक-एक पाई सीधे लाभार्थी के खाते में पहुंचे. इसके साथ ही दोनों योजनाओं में दिए जाने वाले पैसे को ब्याजमुक्त रखा गया है ताकि महिलाओं पर कर्ज का भारी बोझ न पड़े। 

हालांकि, यूपी की योजना का दायरा और तरीका थोड़ा अलग है. बिहार जहां एकमुश्त और चरणबद्ध वित्तीय सहायता देने पर केंद्रित था, वहीं यूपी सरकार ने इसे स्वयं सहायता समूहों (SHG) के एक मजबूत नेटवर्क से जोड़ दिया है. यूपी में सरकार का लक्ष्य केवल पैसे बांटना नहीं, बल्कि महिलाओं को 'लखपति दीदी' बनाकर गांव-गांव में छोटे-छोटे कुटीर उद्योग, सिलाई केंद्र, डेयरी उत्पादन और ई-रिक्शा संचालन जैसे कामों से जोड़ना है। 

कानून-व्यवस्था के भरोसे से आगे आर्थिक आत्मनिर्भरता का सफर
उत्तर प्रदेश की राजनीति को गहराई से समझने वाले जानते हैं कि 2017 के बाद से योगी आदित्यनाथ की सबसे बड़ी ताकत राज्य की कानून-व्यवस्था रही है. सड़कों पर सुरक्षा का माहौल, अपराधियों पर कार्रवाई और सेफ सिटी जैसी योजनाओं ने महिलाओं के बीच योगी सरकार के प्रति एक गहरा विश्वास पैदा किया। 

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अक्सर मंचों से इस बात को दोहराते रहे हैं कि महिलाओं की सुरक्षा और उनका स्वावलंबन एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. हाल ही में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में अपनी सोच को सामने रखते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था- 

"अगर प्रदेश की आधी आबादी को घर के भीतर ही सीमित रखा जाएगा, तो राज्य का विकास अधूरा रहेगा. हमारी सरकार महिलाओं की सुरक्षा से लेकर उनके सम्मान और स्वावलंबन के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है. जब गांव की हमारी बहनें आर्थिक रूप से मजबूत होंगी, तो पूरा उत्तर प्रदेश आत्मनिर्भर बनेगा। 

यूपी की महिला वोटरों में योगी की ओर से मिला सुरक्षा का भरोसा पहले से मजबूत था, अब उसमें एक लाख रुपए के ब्याजमुक्त क्रेडिट का आर्थिक संबल जोड़कर इस वोटबैंक के इर्द-गिर्द एक अभेद्य किला बनाने की तैयारी है। 

विपक्ष की चुनौती और डिंपल यादव का फैक्टर
इस सियासी बिसात पर समाजवादी पार्टी भी शांत नहीं बैठी है. अखिलेश यादव जानते हैं कि अगर 2027 में सत्ता की ओर बढ़ना है तो महिला वोटरों के बीच सेंध लगानी ही होगी. इसके लिए सपा ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है और मैनपुरी से सांसद डिंपल यादव को महिला संवाद कार्यक्रमों के अग्रिम मोर्चे पर खड़ा कर दिया है। 

डिंपल यादव लगातार महिलाओं के मुद्दों, महंगाई, रसोई के बजट और महिला सुरक्षा पर योगी सरकार को घेरने की कोशिश कर रही हैं. वे खुद को गांव-देहात की महिलाओं से जोड़कर सपा के पक्ष में एक सॉफ्ट कॉर्नर बनाने में जुटी हैं. अखिलेश यादव का यह दांव काम न कर जाए, इसी आशंका के काट के रूप में योगी सरकार की यह योजना बेहद अहम मानी जा रही है. सपा के भावुक अपीलों वाले दांव के जवाब में भाजपा का यह कदम सीधे आर्थिक राहत देने वाला एक बड़ा प्रशासनिक और राजनीतिक हमला है। 

क्या यूपी में दोहराया जाएगा बिहार का करिश्मा?
उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति हमेशा से जातीय समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती रही है. लेकिन हाल के वर्षों में 'महिला वोटबैंक' एक ऐसी कैटेगरी बनकर उभरी है जो जाति और मजहब की दीवारों को तोड़कर वोट करती है। 

दिसंबर से जब 1 करोड़ महिलाओं के खातों में 20,000 रुपए की पहली किस्त पहुंचनी शुरू होगी, तो इसका सीधा असर गांव-गांव के घरों पर पड़ेगा. एक लाख करोड़ रुपये के विशाल दायरे वाली यह योजना यदि धरातल पर समयबद्ध तरीके से लागू हो जाती है, तो यह चुनाव की पूरी पटकथा को बदलने की क्षमता रखती है। 

योगी आदित्यनाथ ने अपने शासन के मजबूत पहलू यानी कानून-व्यवस्था के साथ जब इस आर्थिक स्वावलंबन को जोड़ा है, तो यह विपक्ष के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है. बिहार में जिस तरह महिला वोटरों ने सरकार की वापसी का रास्ता साफ किया था, ठीक उसी तर्ज पर यूपी में भी इस योजना को एक 'गेमचेंजर' माना जा रहा है. 2027 की चुनावी जंग में यह देखना दिलचस्प होगा कि विपक्ष के वादे भारी पड़ते हैं या योगी सरकार का यह एक लाख रुपए का ‘आत्मनिर्भरता मॉडल। 

Dinesh Kumar Purwar

Editor, Pramodan News

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