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नॉर्थ कोरिया पर साउथ कोरिया की कोर्ट का बड़ा फैसला, 32 मिलियन डॉलर का जुर्माना

सियोल

नॉर्थ कोरिया ने 2020 में गुस्से में साउथ कोरिया का एक साझा संपर्क कार्यालय ही उड़ा दिया था. अब करीब 6 साल बाद इस मामले में साउथ कोरिया की कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है. सियोल सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने नॉर्थ कोरिया को 44.6 अरब वॉन (करीब 32. 5 करोड़ डॉलर) का भुगतान करने का आदेश दिया है. रकम कएसोंग में बनाए गए संयुक्त संपर्क कार्यालय को उड़ाने से हुए नुकसान के लिए है। 

हालांकि इस फैसले का असर फिलहाल प्रतीकात्मक ही माना जा रहा है. इसकी वजह यह है कि साउथ कोरिया के पास नॉर्थ कोरिया से इस रकम की वसूली कराने का कोई साफ रास्ता नहीं है. दोनों देशों के बीच राजनयिक रिश्ते बेहद खराब हैं. ऐसे में कोर्ट का आदेश लागू कराना बड़ी चुनौती है। 

यह मामला इसलिए भी खास है क्योंकि पहली बार साउथ कोरिया की सरकार ने नॉर्थ कोरिया के खिलाफ कोर्ट में मुकदमा किया था. इससे पहले कुछ लोग मानवाधिकार उल्लंघन और दूसरे मामलों को लेकर नॉर्थ कोरिया की सरकार पर मुकदमा कर चुके हैं। 

साउथ कोरिया ने 2023 में यह केस दायर किया था. सरकार ने कहा था कि नॉर्थ कोरिया ने कएसोंग में संपर्क कार्यालय को उड़ाकर गैरकानूनी और हिंसक कार्रवाई की. इससे दोनों देशों के बीच हुए पुराने समझौतों का उल्लंघन हुआ. साथ ही आपसी सम्मान और भरोसे को भी बड़ा नुकसान पहुंचा। 

दरअसल, यह संयुक्त संपर्क कार्यालय कएसोंग में बनाया गया था. इसका मकसद दोनों देशों के बीच बातचीत और संपर्क का रास्ता बनाए रखना था. लेकिन 2020 में दोनों देशों के रिश्ते तेजी से बिगड़ने लगे। 

जून 2020 में नॉर्थ कोरिया ने विस्फोट करके इस इमारत को उड़ा दिया. उस समय इमारत खाली थी. कोरोना महामारी के कारण नॉर्थ कोरिया ने जनवरी में ही दफ्तर बंद कर दिया था। 

नॉर्थ कोरिया साउथ कोरिया से इस बात पर नाराज था कि वह उत्तर कोरियाई लोगों को सीमा पार गुब्बारों के जरिए प्योंगयांग विरोधी पर्चे भेजने से नहीं रोक रहा था. इसी मुद्दे को लेकर उसने सियोल के खिलाफ कड़ी नाराजगी जताई थी। 

न्यूक्लियर वार्ता टूटने के बाद बढ़ा तनाव
दफ्तर को उड़ाने की घटना को सिर्फ सीमा विवाद के तौर पर नहीं देखा गया था. उस समय अमेरिका और नॉर्थ कोरिया के बीच परमाणु वार्ता भी ठप हो चुकी थी। 

2018 में नॉर्थ कोरिया के नेता किम जोंग उन और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच पहली शिखर वार्ता हुई थी. तत्कालीन साउथ कोरियाई राष्ट्रपति मून जे-इन ने दोनों देशों के बीच बातचीत शुरू कराने में अहम भूमिका निभाई थी। 

लेकिन 2019 में किम और ट्रंप की दूसरी मुलाकात के बाद बातचीत आगे नहीं बढ़ सकी. नॉर्थ कोरिया प्रतिबंधों में बड़ी राहत चाहता था. बदले में वह अपने परमाणु कार्यक्रम के कुछ हिस्से को छोड़ने की बात कर रहा था. अमेरिका ने उसकी मांग स्वीकार नहीं की. इसके बाद दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ता गया. नॉर्थ कोरिया ने अपने परमाणु हथियार और मिसाइल कार्यक्रम को और तेज कर दिया। 

साउथ कोरिया में पिछले साल सत्ता बदलने के बाद नॉर्थ कोरिया को लेकर सरकार का रुख कुछ नरम हुआ. मौजूदा राष्ट्रपति ली जे म्यंग ने प्योंगयांग के साथ बातचीत फिर शुरू करने की अपील की. लेकिन नॉर्थ कोरिया ने अब तक इन अपीलों को ज्यादा तवज्जो नहीं दी है. किम जोंग उन ने साउथ कोरिया को अपना सबसे शत्रुतापूर्ण देश तक बताया है। 

नॉर्थ कोरिया ने इसी दौरान रूस और चीन के साथ अपने रिश्ते भी मजबूत किए हैं. रूस के साथ उसकी सैन्य साझेदारी बढ़ी है. अमेरिका की ओर से भी किम के साथ फिर बातचीत शुरू करने में रुचि दिखाई गई है. लेकिन प्योंगयांग ने अभी तक बातचीत के अमेरिकी प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया है। 

साउथ कोरिया ने कहा- बातचीत से ही सुलझेगा मामला
साउथ कोरिया के एकीकरण मंत्रालय ने अदालत के फैसले का सम्मान करने की बात कही है. मंत्रालय ने यह भी कहा कि दोनों देशों के बीच बातचीत फिर शुरू होनी चाहिए। 

मंत्रालय के मुताबिक, दक्षिण और उत्तर के बीच सभी मुद्दों का समाधान बातचीत और सहयोग के जरिए किया जाना चाहिए. वहीं नॉर्थ कोरिया की सरकारी मीडिया ने अदालत के इस फैसले पर तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। 

इस तरह 2020 में उड़ाया गया एक दफ्तर अब दोनों देशों के बिगड़े रिश्तों और रुकी हुई बातचीत का प्रतीक बन गया है. अदालत का फैसला साउथ कोरिया के पक्ष में आया है, लेकिन नॉर्थ कोरिया से रकम की वसूली और दोनों देशों के बीच संवाद बहाल करना अभी भी बड़ी चुनौती है। 

 

Dinesh Kumar Purwar

Editor, Pramodan News

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