राजनीति

ममता बनर्जी का बदला सियासी समीकरण, अब लेफ्ट से बातचीत; SIR पर विपक्षी एकता की कवायद

नई दिल्ली
ममता बनर्जी की राजनीति एक ही सूत्र पर चलती दिखती है। जरूरत पड़ी तो भाजपा के साथ खड़ी हो गईं, जरूरत पड़ी तो कांग्रेस के साथ चली गईं। अब जरूरत पड़ने पर लेफ्ट की ओर हाथ बढ़ा रही हैं। बंगाल में दशकों तक लेफ्ट को अपना सबसे बड़ा दुश्मन बताने वाली नेता आज उसी लेफ्ट से बात कर रही हैं। यह बदलाव अचानक नहीं आया। सीपीआई(एम) महासचिव एमए बेबी ने चुनाव आयोग और स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर के मुद्दे पर विपक्षी नेताओं को पत्र लिखा। पत्र में संयुक्त रणनीति बनाने की बात कही गई। इसके बाद ममता बनर्जी ने उनसे संपर्क किया। दोनों ने फोन पर बात की। चर्चा विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने की संभावना पर हुई।

सेरामपुर की जनसभा में ममता बनर्जी ने कहा कि अब यह देखने की जरूरत नहीं कि कौन लाल है, कौन नीला है या कौन पीला है। अब हम सब एक हैं। उन्होंने 30 सितंबर की प्रस्तावित इंडिया ब्लॉक बैठक का भी जिक्र किया और विपक्षी पार्टियों से एकजुट होने को कहा। बयान साफ है। रंग अब मायने नहीं रखते। लेकिन बंगाल की राजनीति में यह बात नई है। तृणमूल कांग्रेस बनी ही लेफ्ट को हराने के वादे पर थी। ममता बनर्जी सालों तक सीपीआई(एम) की सबसे बड़ी विरोधी रहीं। अब वही नेता लेफ्ट के साथ बैठने को तैयार हैं।

लेफ्ट विरोध से बनी पहचान
बंगाल में ममता बनर्जी की राजनीतिक पहचान लेफ्ट फ्रंट के विरोध से बनी। 1998 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ी और तृणमूल कांग्रेस बनाई। इसके बाद पार्टी लेफ्ट की मुख्य चुनौती बन गई। 2011 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल-कांग्रेस गठबंधन ने 34 साल पुरानी लेफ्ट सरकार को हराया। ममता मुख्यमंत्री बनीं। लेफ्ट को भारी हार मिली। उसके बाद लंबे समय तक ममता बनर्जी लेफ्ट को बंगाल की तरक्की में सबसे बड़ी रुकावट बताती रहीं। सीपीआई(एम) तृणमूल पर हिंसा, मौकापरस्ती और असहिष्णुता के आरोप लगाती रही। दोनों पक्ष सड़क से विधानसभा तक एक-दूसरे के खिलाफ लड़ते रहे।

अब उन्हीं दो ताकतों को साथ आने के लिए कहा जा रहा है। पुराने आरोपों का कोई सार्वजनिक हिसाब नहीं हुआ। दशकों की दुश्मनी कैसे खत्म हुई, इसका कोई साफ जवाब भी नहीं दिया गया। जब बंगाल में लेफ्ट पर हमला करना होता है, पुराने आरोप काम आते हैं। जब बड़े विपक्षी मंच की जरूरत होती है, तो लाल, नीला और पीला रंग एक हो जाते हैं

भाजपा के साथ भी गईं, कांग्रेस के साथ भी
राष्ट्रीय राजनीति में ममता बनर्जी का सफर बार-बार रुख बदलने का रहा है। 1999 में तृणमूल भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए में शामिल हुई। ममता रेल मंत्री बनीं। 2001 में एनडीए छोड़ दिया। 2003 में वाजपेयी सरकार में वापस आईं। 2004 में कोयला और खान मंत्री रहीं। 2009 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए-2 सरकार में शामिल हुईं और फिर रेल मंत्री बनीं। 2012 में मल्टी-ब्रांड रिटेल में एफडीआई, डीजल की कीमतें बढ़ाने और एलपीजी सब्सिडी सीमित करने जैसे मुद्दों पर समर्थन वापस ले लिया।

यानी भाजपा कभी गठबंधन साथी रही, कभी दुश्मन। कांग्रेस कभी सहयोगी रही, कभी निशाना। लेफ्ट कभी मुख्य दुश्मन था, अब विपक्षी एकता के नाम पर उससे संपर्क हो रहा है।

लेफ्ट के सामने उलझन
सीपीआई(एम) ने साफ कहा है कि यह तृणमूल के साथ चुनावी गठबंधन नहीं है। पार्टी इसे चुनाव आयोग और एसआईआर जैसे मुद्दों पर विपक्ष को जोड़ने की कोशिश बता रही है। लेकिन बंगाल में लेफ्ट के कार्यकर्ताओं के लिए यह आसान नहीं। दशकों से वे तृणमूल के खिलाफ लड़ते रहे हैं। ऐसे में किसी भी सहयोग से उनके समर्थकों में भ्रम फैल सकता है। पार्टी के वैकल्पिक राजनीति के दावे पर भी असर पड़ सकता है।

सीपीआई(एम) नेता सुजान चक्रवर्ती ने कहा है कि लेफ्ट का भाजपा विरोध नया नहीं है। पार्टी अकेले भी भाजपा से लड़ती रही है। उनके बयान से साफ है कि बंगाल लेफ्ट तृणमूल के साथ किसी समझ को लेकर सतर्क है। यह सतर्कता स्वाभाविक है। तृणमूल की पहचान लेफ्ट को हराकर बनी थी, उसके साथ हाथ मिलाकर नहीं। जो पार्टी खुद को लेफ्ट शासन का विकल्प बताती थी, अब लेफ्ट का सहयोग मांग रही है क्योंकि उसे बड़े राजनीतिक कवर की जरूरत है।

शुभेंदु अधिकारी का हमला
बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इस नए समीकरण पर हमला बोला है। उन्होंने कहा कि जो पार्टी कभी सीपीएम के खिलाफ लड़ती थी, अब उसी की दोस्त बन रही है। तृणमूल कांग्रेस का जन्म सीपीएम के लंबे शासन के खिलाफ हुआ था। आज वही सीपीएम उसकी राजनीतिक साझेदार बन गई है। इस दौरान उन्होंने विधानसभा की एक घटना का भी जिक्र किया। उनके मुताबिक, वोटिंग के दौरान तृणमूल के एक हिस्से और सीपीआई(एम) के अकेले विधायक का रुख एक जैसा रहा। उन्होंने इसे दोनों पक्षों के बीच बनती समझ का संकेत बताया।

सिद्धांत या मौजूदा जरूरत?
अभी तृणमूल और सीपीआई(एम) के बीच कोई पक्का चुनावी गठबंधन घोषित नहीं हुआ है। बातचीत हो रही है। चुनिंदा मुद्दों पर साथ काम करने की अपील की जा रही है। लेकिन बड़ा संदेश पहले से साफ है। ममता बनर्जी की राजनीति में कल के सिद्धांत आज की जरूरत के हिसाब से बदल सकते हैं। जब भाजपा चाहिए थी, एनडीए में गईं। जब कांग्रेस चाहिए थी, यूपीए में गईं। जब लेफ्ट को हराना था, एंटी-लेफ्ट राजनीति को आंदोलन का आधार बनाया। अब बड़े विपक्षी मंच की जरूरत है, तो लेफ्ट के साथ बैठने को तैयार हैं। यह ममता बनर्जी की सुविधा की राजनीति का एक और अध्याय है। इसमें वफादारी बदलती है, दुश्मन साथी बन जाते हैं और सत्ता की जरूरत के हिसाब से विचारधारा को ढाल लिया जाता है।

Dinesh Kumar Purwar

Editor, Pramodan News

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