राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय

दिल्ली में 12 साल बाद झुग्गी-बस्तियों का सर्वे, ‘जहां झुग्गी वहां मकान’ योजना से मिलेगा पक्का घर

नई दिल्ली
 दिल्ली सरकार 12 साल बाद झुग्गी-बस्तियों और जेजे क्लस्टर का नया सर्वे करने जा रही है। इसका मकसद ऐसी बस्तियों और परिवारों की संख्या का पता लगाना और अपने प्रस्तावित 'जहां झुग्गी, वहां मकान' (इन-सीटू पुनर्वास) प्रोग्राम के लिए लाभार्थियों की पहचान करना है, ताकि उन्हें बेहतर सुविधाएं दी जा सकें। शहरी विकास मंत्री आशीष सूद ने कहा कि सर्वे के दो हफ्ते में शुरू होने की उम्मीद है। यह साबित करने के लिए कि कोई व्यक्ति कट-ऑफ तारीख से पहले झुग्गी में रह रहा था और पुनर्वास के लिए योग्य है, वोटर ID कार्ड, राशन कार्ड और बिजली के बिल जैसे दस्तावेजों की जरूरत होगी।

'इन-सीटू डेवलपमेंट मॉडल' के तहत दिए जाएंगे फ्लैट: आशीष सूद
मंत्री आशीष सूद ने कहा कि दिल्ली की बीजेपी सरकार ने पुनर्वास के नियमों का दायरा बढ़ाया है ताकि 2014 के बाद झुग्गी में आए लोगों को भी सम्मानजनक घर मिल सकें। योग्य परिवारों को 'इन-सीटू डेवलपमेंट मॉडल' के तहत फ्लैट दिए जाएंगे, जिसका मतलब है कि उन्हें उसी जगह के पास बसाया जाएगा जहां वे अभी रह रहे हैं। दिल्ली सरकार के 2014 के पिछले बड़े सर्वे में लगभग 700 जेजे बस्तियों और करीब 3.3 लाख परिवारों की पहचान की गई थी। अभी सरकार के पास झुग्गी क्लस्टर या उनमें रहने वाले परिवारों की संख्या के बारे में कोई वेरिफाइड आंकड़े नहीं हैं।

'जहां झुग्गी, वहां मकान' पॉलिसी
एक अधिकारी ने कहा कि 'जहां झुग्गी, वहां मकान' पॉलिसी को लागू करने से पहले इस कवायद में बस्तियों की मैपिंग की जाएगी, परिवारों की संख्या का आकलन किया जाएगा और लाभार्थियों का वेरिफिकेशन किया जाएगा। दिल्ली विधानसभा ने हाल ही में 'दिल्ली अर्बन शेल्टर इम्प्रूवमेंट बोर्ड (संशोधन) बिल, 2026' पास किया है। इसमें DUSIB एक्ट, 2010 में संशोधन करके झुग्गी क्लस्टर को जेजे बस्ती के तौर पर पहचानने के लिए कट-ऑफ तारीख एक जनवरी, 2006 को बदलकर एक जनवरी, 2025 करने का प्रस्ताव था

मौजूदा कानून की बड़ी बातें
    मौजूदा कानून के तहत, किसी बस्ती को जेजे बस्ती के तौर पर तब मान्यता मिल सकती है जब उसमें कम से कम 50 घर हों और वह कुछ शर्तों को पूरा करती हो
    इनमें से एक शर्त यह है कि वह 1 जनवरी, 2006 से मौजूद रही हो, अभी दिल्ली में 675 मान्यता प्राप्त जेजे क्लस्टर हैं
    हालांकि अधिकारियों का अनुमान है कि असल संख्या लगभग 750 है
    2015 के बाद कई नई बस्तियां बसीं।
    जेजे क्लस्टरों में ड्राइवर, घरेलू कामगार, सब्जी बेचने वाले और ऑटो-रिक्शा चलाने वाले जैसे हजारों कामकाजी लोग रहते हैं, जो शहर की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा हैं।

पुनर्वास के लिए कट-ऑफ तारीख अब 2025
19 साल की इस समय-सीमा को बढ़ाने का मकसद पात्रता और तय शर्तों के आधार पर, बड़ी संख्या में नई बस्तियों को कानूनी पुनर्वास ढांचे के दायरे में लाना है। प्रस्तावित कट-ऑफ तारीख अब 2025 होने के कारण, अधिकारियों को उम्मीद है कि जिन बस्तियों और घरों का आकलन किया जाना है, उनकी संख्या में काफी बढ़ोतरी होगी।

 

Dinesh Kumar Purwar

Editor, Pramodan News

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